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Amita tiwari's Blog (82)

थाली खाली लघु -कथा

    मेरे छोटे से बेटे तक  ने थाली सरका दी । कहा नहीं खाऊँगा  । इस खाने को उगाने वाले अन्नदाता यदि  भूखे  हैं ,बेघर  हैं उनकी आवाज़ गले मे घुट रही है  तो नैतिकता की मांग है कि मुझे ये खाना खाने का हक़  नहीं है । नहीं जानता हूँ कि कौन कितना गलत है या सही है  लेकिन इतना ज़रूर जानता हूँ कि ऐसे मौसम मे घर छोडने का ,सड़कों पर बैठने का  और  सर पर कफन बांधने का  शौक किसी को नहीं हो सकता । जब    भविष्य  अंधकारमय लगता  है तभी  वर्तमान  ऐसे कदम उठाता है  तब जीवन और मौत मे कोई अंतर नहीं रह जाता  है । एक आम…

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Added by amita tiwari on December 9, 2020 at 1:43am — 8 Comments

करोना -योद्धाओं के नाम

करोना -योद्धा  सखी    के नाम 
 
 सुनो ! अपना ध्यान रखना 
हरगिज़ हरगिज़ न डिगना 
हौसलों को हिम्मत बँधाते रहना 
धैर्य  ध्वजा   है  फहराते  रहना 
हमेशा से ही  सिपाही  हो तुम 
विजय सी ही वाहवाही  हो तुम 
अब के जंग निज अपने संग है 
वैरी का बिलकुल अजीब रंग है 
कितने ही समर तुमने हैं जीते 
कितने ही वार किए हैं…
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Added by amita tiwari on November 24, 2020 at 1:30am — 3 Comments

मेरे युग की तस्वीर

सच यह है कि

अंधा होने के लिए नेत्रहीन होना कोई शर्त नहीं होती

वरना किसी युग में द्रौपदी कभी कहीं  नही रोती

 

बल्कि सच यह है कि

जब जब राजा अंधा होता ,पूर्ण अंध हो जाता काज 

क्या मर्यादा,वचन प्रतिज्ञा सब का सब कोरी बकवास…

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Added by amita tiwari on October 30, 2020 at 12:00am — 4 Comments

तो कोई  करे भी तो क्या करे

अनगिन हों सूरज दहकते हों तारे 

पर साँसों में भी घुल जाए अँधियारा 

तो कोई  करे भी तो क्या करे  

प्रहरी हों रक्षक पति ही पति हों 

पर फांसी हो जाये निज साड़ी किनारा 

तो कोई  करे भी तो क्या करे …

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Added by amita tiwari on August 1, 2020 at 5:30am — 3 Comments

देख लिया न

सुनते आए थे कि घूरे के …

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Added by amita tiwari on July 15, 2020 at 3:30am — 1 Comment

दिन दीन हो चला

एक मजदूर जननी एक मजबूत जननी



कितने आलसी हो चले हैं दिन

कितनी चुस्त हो चली हैं रातें

इधर खत्म से हो चले किस्से

उधर खत्म सी हो चली बातें

जानते थे दिन कि

अब क्यों हो चले है ऐसे

जानते थे दिन कि

कभी नहीं थे ऐसे ऐसे

सुनते थे कि दिन -दिन का फेर होता है

सुनते थे कि इंसाफ मे देर हो भी जाये

सुनते थे कि इंसाफ मे अंधेर नहीं होता है

पर दिन का एक नकाब…

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Added by amita tiwari on May 31, 2020 at 8:00pm — 2 Comments

मातृ -महक

मातृ -महक
 
माँ बहुत स्वार्थी होती है
यह बात मुझे कभी समझ नहीं आती थी कि
मै समझदार जिम्मेदार क्यों नहीं हो पाती थी
सर्वदा सुरक्षित सर्वदा…
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Added by amita tiwari on May 13, 2020 at 3:00am — 2 Comments

शहर शर्म के चलते

कौन कहता  है कि

मन तभी  …

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Added by amita tiwari on April 30, 2020 at 3:00am — 5 Comments

कुछ भी निजी कदापि नहीं होता

कुछ भी निजी कदापि नहीं होता 
तुम्हारा मांसाहारी  होना 
या हमारा  शाकाहारी होना 
स्वंय तक कभी सीमित नहीं होता 
कुछ भी निजी कदापि नहीं होता 
तुम्हारा भरपेट से ज़्यादा खाना 
किसी की थाली आधी रह जाना 
स्वंय तक कभी सीमित नहीं होता   
कुछ भी निजी कदापि नहीं होता 
तुम्हारा मंज़िल दर  मंज़िल बढ़ाते जाना 
किसी की झुग्गी का…
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Added by amita tiwari on April 17, 2020 at 9:00am — 2 Comments

बस जुगनू भर को छोड़ देते

जिस मार्ग पे तुम अब चल निकले हो 

उस मार्ग से परिचय नहीं है  …

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Added by amita tiwari on April 13, 2020 at 2:00am — 1 Comment

धूप छाँह होने वाले

तमाम उम्र लगे रहे शहर शहर हो जाने में 
क्यों गांव गांव आज फिर होने लगी है ज़िंदगी …
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Added by amita tiwari on April 1, 2020 at 1:30am — 1 Comment

एक अवसर सा मानो हाथ आया जबरन

एक अवसर सा मानो हाथ आया जबरन

 
बहुत दिन बाद
इतिहास के पन्नों पर दर्ज़ होंगे
ये आजकल के दिन
ये जबरन बंद के दिन
 
जब पूरा परिवार
एक पूरे परिवार की तरह
पूरा -पूरा दिन साथ -साथ बैठ…
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Added by amita tiwari on March 20, 2020 at 7:00pm — 1 Comment

समूची धरा बिन ये अंबर अधूरा है

समूची धरा बिन ये अंबर अधूरा है

ये जो है लड़की

हैं उसकी जो आँखे

हैं उनमें जो सपने

जागे से सपने

भागे से सपने…

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Added by amita tiwari on March 4, 2020 at 1:07am — 2 Comments

किसी को कुछ नहीं होता

किसी को कुछ नहीं होता

तोता पंखी किरणों में

घिर कर

गिर कर

फिर से उठ कर

जो दिवाकर से दृष्ष्टि मिलाई

तो पलक को स्थिती समझ नहीं आयी

ऐसा ही होता है प्राय

मन ही खोता है प्राय

बाकी किसी को कुछ नहीं होता

किसी को भी



प्रचंड की आँख में झांकना

कोई दृष्टता है क्या

केवल मन उठता है

प्रश्न प्रश्न उठाता है

लावे की लावे से

मुलाकात…

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Added by amita tiwari on February 29, 2020 at 1:30am — 2 Comments

जायदाद के हकदार

अम्मा का जाना

जैसे पर्दों का हट जाना

एक- एक कर सारे के सारे तार- तार हो गए

जिगर के सब टुकड़े जायदाद के हकदार हो गए


छोटे छोटे पुर्जे तक बांटे गए

सारे कागज़ पत्र तक छांटे गए

जिगर के टुकड़े थे वो सारी जायदाद के हकदार हो गए
 
कुछ…
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Added by amita tiwari on February 15, 2020 at 7:30pm — 5 Comments

ये नहीं कहना चाहते मेरे शब्द

ये नहीं कहना चाहते मेरे शब्द


चढ़ाये मैंने जो कुछ स्वर



बस केवल अंजुरी भर



पूरे युग के चौराहे पर



कुछ कानों को क्यों नागवार गुजरे



ये नहीं कहना चाहते मेरे शब्द




वैसे सच है ये भी कि



उम्मीद ही नहीं थी इस बार



कि खाली जाएंगे सब वार



कि किसी को चुभेंगे ही नहीं



ये नहीं कहना चाहते मेरे शब्द





ये भी नहीं कहना चाहते मेरे शब्द



कि अब जो कुछ भी हैं…

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Added by amita tiwari on February 9, 2020 at 9:00am — 2 Comments

माँ के न हो जाने के बाद

माँ के होने और अचानक
 माँ के न होने जाने के बाद  
महज एक शब्द का अंतर नहीं हो जाता 
माँ का होना होता रहा होता था क्या 
एकदम समझ में आने लग जाता है 
माँ के न होने जाने के बाद 
 लगभग वैसे ही 
जैसे सूरज के होने में लगता ही नहीं
सूरज का होना कितनी बड़ी …
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Added by amita tiwari on January 29, 2020 at 1:30am — 1 Comment

पधार गए हो नए साल जो

पधार गए हो नए साल जो

खुश रहो औ ख़ुश रहने दो

आओ जीमो मौज मनाओ

जो जमा हुआ वो बहने दो

पथ भी रहें पंथी भी रहें

राहें भी दुश्वार न हों

सुरों मे गीत रहें न रहें…

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Added by amita tiwari on January 4, 2020 at 4:00am — 4 Comments

इतिहास अदालत होती है क्या

कौन कहता है कि इतिहास कोईअदालत होती है 

जिस में हार गयों की महज़ मुखाल्फत होती है 

और यह भी कि 

यह केवल विजयी का फलसफा लिखती है 

सफे पर सफा लिखती है 

इसलिए  मान लिया जाना चाहिए

कि जीत  यकीनन लाजिमी है 

कैसे भी हो  पर हो केवल विजय

लेकिन

शायद सही हो…

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Added by amita tiwari on August 23, 2019 at 1:00am — 4 Comments

सच बात तो यह

सुनो

वहम है तुमको

कि स्वर मिला स्वर में तुम्हारे.

मैं कृत -कृत हो  जाऊंगी…

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Added by amita tiwari on August 17, 2019 at 2:00am — No Comments

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