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माँ के न हो जाने के बाद

माँ के होने और अचानक
 माँ के न होने जाने के बाद  
महज एक शब्द का अंतर नहीं हो जाता 
माँ का होना होता रहा होता था क्या 
एकदम समझ में आने लग जाता है 
माँ के न होने जाने के बाद 
 लगभग वैसे ही 
जैसे सूरज के होने में लगता ही नहीं
सूरज का होना कितनी बड़ी 
बल्कि सबसे बड़ी इनायत होती है
सृष्टि उसी के दम से पलती है  
अपनी जानी दुनिया 
और न पहचानी  दुनिया 
उसी के भरोसे चलती है 
सूरज के चले जाते ही 
अँधेरा डराने लगता है 
दूधपीते  बाल को भी 
दूध कमाते हाथ को भी
घबराने लगता है  
सूरज रहता है 
तो कहाँ किसी को कहता है 
कि रौशनी जलाने की ज़रूरत नहीं 
किसी को घबराने की ज़रुरत नहीं 
बस होता है सूरज 
और बेखबर रहता है जीव 
सूरज के होने के एहसास से 
विकल्प व्याकुल प्रयास से 
बस होता है सूरज 
एक तसल्ली 
समूची धरा के लिए 
और उसके बाद 
अन्धकार ही अन्धकार 
जुगनू हो जाने का प्रयास 
माँ के न हो जाने के बाद 
...............................
मौलिक व अप्रकाशित 

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Comment

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Comment by Samar kabeer on January 30, 2020 at 6:02pm

मुहतरमा अमिता तिवारी जी आदाब,सुंदर प्रस्तुति हेतु बधाई ।

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