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SANDEEP KUMAR PATEL's Blog (238)

कुछ मुक्तक {मुक्तक काव्य "कमला "}

मुक्तक काव्य "कमला "



मन वीणा को झंकृत करती, मीठा स्पंदन हो कमला

छंदों में रस वर्षा करती, रस अभिवंदन हो कमला

निर्झर की पावन झर झर तुम, हंसती हो सरगम जैसा

साधक है खुद स्वर तेरे तो, तुम स्वर गुंजन हो कमला



तन मलयागिर का चन्दन सा, मुखड़ा कुंदन है कमला…

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Added by SANDEEP KUMAR PATEL on June 24, 2012 at 10:40am — 7 Comments

जय जय भारत जय जय भारत

जय जय भारत जय जय भारत

नारद शारद करते आरत

जय जय भारत जय जय भारत



वीरों की जननी है भारत

संतों की धरनी है भारत

अब तो बस ठगनी है भारत

जय जय भारत जय जय भारत



नव नव गुंडे फिरते हैं अब

घोटाले ही करते हैं अब

चोरों की सत्ता है भारत

जय जय भारत जय जय भारत



आतंकी अब मौज मनाते

नक्शल वादी फ़ौज बनाते

दहशत की संज्ञा है भारत

जय जय भारत जय जय भारत



गंगा की धारा है निर्मल

यमुना भी बहती है कल कल

पुस्तक में ऐसा था भारत

जय जय…

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Added by SANDEEP KUMAR PATEL on June 23, 2012 at 10:30am — 12 Comments

बारिश का मौसम

बारिश का मौसम

काले काले मेघ

काली काली जुल्फों के सायों की मानिंद

टिप -टिप टिप- टिप

बूँदें गिरती है

भीगी भीगी जुल्फों से टूटे मोती से

भिगोती है तन

मेरी सानों को छूती…

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Added by SANDEEP KUMAR PATEL on June 21, 2012 at 6:27pm — 9 Comments

दरख्त की पीर कौन समझेगा

इश्क के मजबूत दरख्त में

शक की दीमक लग गयी है

यकीन के सब्ज पत्ते

पीले पड़ पड़ के

रिश्तों की ड़ाल से बेसाख्ता गिर रहे हैं

झूठ के तेज़ झोंके

दरख्त को जड़ से उखाड़ने की फिराक में हैं

सच की माटी जड़ों का…

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Added by SANDEEP KUMAR PATEL on June 21, 2012 at 11:09am — 9 Comments

मेरे शहर की बारिश

मेरे शहर की बारिश

लेकर आती है

ठंडी हवा के झोंकों में लिपटी 

माटी की सोंधी खुशबू 

बेसाख्ता बरसती बूँदें

समेटे प्यार दुलार भरी ठंडक

और तन बदन भिगोती

मन तक भिगो जाती है

लेकिन किसी को ये सब झूठ लगता है

क्यूंकि ये लेकर आती है

घरों की टपकती

छत की टप-टप

तेज़ हवा के झोंको से सरसराहट

दरवाजों पे आहट

बिरह की आग

सखी की याद

धुत्कार भरी तपिश

भिगोती है तन बदन…

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Added by SANDEEP KUMAR PATEL on June 20, 2012 at 10:40am — 9 Comments

शब्-ए-फुरकत है उजालों की जरुरत क्या है

शब्-ए-फुरकत है उजालों की जरुरत क्या है

पास तुम हो तो इशारों की जरुरत क्या है



तुम बसे हो जो बने नूर-ए-खुदा आँखों में

इन निगाहों को नजारों की जरुरत क्या है



दिल लुटे सबके नज़र उसपे पड़ी जैसे ही

बेचने दिल ये बाजारों की जरुरत क्या है…



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Added by SANDEEP KUMAR PATEL on June 15, 2012 at 9:33am — 4 Comments

अब दीप मुल्के इश्क में उन्माद चाहिए

रो मत अरे नादां नहीं ये आब चाहिए

दुनिया बदलने को दिलों में आग चाहिए



दहशत मिटे वहशत मिटे इस मुल्क से मेरे

बिस्मिल,भगत,अशफाक औ आज़ाद चाहिए



लड़ने बुराई से मिटाने गर्दिश-ए-वतन

चट्टान सा तन औ जिगर फौलाद चाहिए…



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Added by SANDEEP KUMAR PATEL on June 11, 2012 at 5:13pm — 9 Comments

पता ही पूछ लेते आप भी मयखाने का

दिखा है आइने में अक्स जो अंजाने का

कोई किरदार था भूले हुए अफ़साने का



मुझे जिसने भुलाया चार दिन की चाहत कर

वही अब ढूंढता है इक बहाना आने का



शराबी मिल गया गुजरात की गलियों में गर

पता ही पूछ लेते आप भी मयखाने का



जरा सी बात पर…

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Added by SANDEEP KUMAR PATEL on June 11, 2012 at 10:19am — 4 Comments

कोई शायर ग़ज़ल से मिल रहा जैसे

सदा मैंने सुनी उसने कहा जैसे

नहीं आती नज़र वो है खुदा जैसे



ग़मों में भी हसीं मुस्कान रखते हैं

कभी पानी न आँखों से बहा जैसे



उसे मैं देख कर खो ही गया मौला


कोई शायर ग़ज़ल से मिल रहा जैसे…



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Added by SANDEEP KUMAR PATEL on June 10, 2012 at 4:46pm — 3 Comments

धरा लुट गयी तो गगन बेच देंगे

लुटेरे वतन के वतन बेच देंगे

धरा लुट गयी तो गगन बेच देंगे



सजावट बनावट जिसे भा रही हो

कली फूल क्या है चमन बेच देंगे



अगर आँख खोली न अपनी अभी तो

फरेबी कलामो- रमन बेच देंगे



बनाया नहीं गर नया कुंड कोई…

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Added by SANDEEP KUMAR PATEL on June 8, 2012 at 9:06am — 8 Comments

हैं हर-सू धमाके अमन हो रहा है

यूँ बदनाम अपना वतन हो रहा है

था धरती कभी अब गगन हो रहा है



जो चढ़ फूल देवों 'प' इतरा रहे हैं

बे-ईमान सारा चमन हो रहा है



जो पग में चुभा था कभी खार बनके

वो झूठा फरेबी सुमन हो रहा है



दी आहूति सपनों भरी अब युवा ने…

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Added by SANDEEP KUMAR PATEL on June 6, 2012 at 6:00pm — 10 Comments

२ मुक्तक

''''''''''''''''''''''''''''''''२ मुक्तक '''''''''''''''''''''''''''''''''''



१.

नित बातों से रस बहता है, जैसे तुम मधु हो मधुवन की

मैं देखूं मुख इक टक तेरा ,खिलती सी कली हो उपवन की

ते तन तेरा ये मन तेरा, दूरी मत देना इक पल की

तुम से ही चलती हैं साँसें, इक तुम ही जरुरत…

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Added by SANDEEP KUMAR PATEL on June 5, 2012 at 1:44pm — 5 Comments

खुश्बू से तेरी जब कभी मैं रू-ब-रू हुआ

"""गिरधर ओ मेरे श्याम तुमसे कायनात है

ये सब है तेरा ही करम तुमसे हयात है""""



खुश्बू से तेरी जब कभी मैं रू-ब-रू हुआ

दामन-ए-हिरस-ओ-हबस बे आबरू हुआ



किस्से मैं तेरे सुन रहा हूँ एहतिराम से

पाना है तुझे अब मेरी तू जुस्तजू हुआ



रहमत की नज़र हर्फों में कैसे बयाँ करूँ

आँखों को भिगो कर हमेशा बावजू हुआ



जादू सा तेरा ये करम मैं किस तरह कहूँ

ख्वाबों में दिखा जो वही तो हू-ब-हू…

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Added by SANDEEP KUMAR PATEL on June 4, 2012 at 10:30pm — 6 Comments

माथा सूरज सा दमके, आँखें लगती मधुशाला ||

इन नैनों की खिड़की से, देखा इक योवन आला |

पग पग चल कर आई है , जैसे कोई सुरबाला ||

पुष्पलता सम तन तेरा, मुख चंदा सा उजियाला |

माथा सूरज सा दमके, आँखें लगती मधुशाला ||



निर्झर चाहत का जल हो, तुम हो अमृत सी हाला |

पीकर मन नहिं भरता है, फिर भर लेता हूँ प्याला ||

झूमूं गलियों गलियों में, जपता हूँ तेरी माला |

कोई पागल कहता है , कोई कहता मतवाला ||



सपनों की तुम रानी हो, मन है तेरा सुविशाला…

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Added by SANDEEP KUMAR PATEL on June 4, 2012 at 12:30pm — 6 Comments

मैं काँटों का रस्ता हूँ

तुझको साया कहता हूँ ,  खुद भी तेरे जैसा हूँ



सागर हूँ गहरा लेकिन,  लहरें कहती तन्हा हूँ



मुझसे क्यूँ शरमाते हो,  मैं तो बस आईना हूँ



कहलो गंदा जितना तुम, मैं बस अच्छा सुनता हूँ…



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Added by SANDEEP KUMAR PATEL on June 3, 2012 at 8:30pm — 6 Comments

रूप घनाक्षरी

प्रति चरण ३२ अक्षर, १६-१६ पर दो विश्राम, इक्त्तीस्वां (३१ वाँ) दीर्घ, बत्तीसवां (३२ वाँ ) लघु

शारदा कृपा कर दो मुझको नादान जान

भरो खाली झोली माता ज्ञान का दो वरदान



मैं तेरा ध्यान कर के छंद की रचना करूँ

देश देश गायें सब भारत की बढे शान



छंद मेरे पढ़ें जो भी…

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Added by SANDEEP KUMAR PATEL on June 3, 2012 at 7:00pm — 11 Comments

जला के "दीप" वो शोले बुझाने में मजा आए

ग़ज़ल या गीत गा के सुर मिलाने में मजा आए

बने जब धुन जुदा सी तो सुनाने में मजा आए



न सोना हो सका मुमकिन न जगने में सुकूँ पाया

जगे खुद यार को भी यूँ जगाने में मजा आए



गजब है इश्क ये मौला समझना है बहुत मुश्किल

बिछड़ के यार से खुद को रुलाने में मजा आए…



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Added by SANDEEP KUMAR PATEL on June 3, 2012 at 12:30pm — 6 Comments

साहिबे ईजाद होते जा रहे हैं

बे-अदब आबाद होते जा रहे हैं

इल्म है बरबाद होते जा रहे हैं



देख कर गम इस जमाने का कहें क्या

सब दिले-नाशाद होते जा रहे हैं



गम हमारे देख अपनों को न गम हो

इसलिए हम शाद होते जा रहे हैं



चोर ही जाबित यहाँ पग पग लुटेरे…

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Added by SANDEEP KUMAR PATEL on June 3, 2012 at 9:30am — 8 Comments

इश्क में बरबाद होते जा रहे हैं

इश्क में बरबाद होते जा रहे हैं

अन सुनी फ़रियाद होते जा रहे हैं



प्यार का हमको सलीका क्यूँ न आया

क्यूँ दिले-नाशाद होते जा रहे हैं



जख्म अब गहरे छुपा के मुस्कुराते

दिन-ब-दिन हम शाद होते जा रहे हैं…

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Added by SANDEEP KUMAR PATEL on June 2, 2012 at 12:00pm — 10 Comments

गहरा है ये सागर बहुत साहिल ही नही है

ये दिल मेरा अब इश्क के काबिल ही नहीं है

बिखरा है जो अब टूट के वो दिल ही नहीं है



हम जीते थे जिस शान से यारों के साथ में

वो छूटे हैं पीछे सभी महफ़िल ही नहीं है



गम हैं मेरा जो जान से मारेगा  एक दिन

जो गम को डाले मार वो कातिल ही नहीं…

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Added by SANDEEP KUMAR PATEL on June 1, 2012 at 5:00pm — 16 Comments

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