असंतोष की छटपटाहटें समेटते
गहन वेदना की छायाओं में पले
टूटे विश्वास के घाव खुले-के-खुले
न सिले
सिले ओंठ उन घावों की आस्था की
तकलीफ़ भरी पुकार के
मिट्टी के ढेले के उड़ गए कण हों मानो
उन घावों के मैदान से तुम तक अब
कोई आवाज़ तक नहीं आती
आदि से अनन्त हुए
सनातन संघर्षी घावों की आयु है कब से
तुम्हारे संवेदनशील भावों से अनजान
घायल दिन का अस्थि-पंजर समेटे
एक और न गुज़रती रात की अकथनीय पीड़ा…
ContinueAdded by vijay nikore on October 31, 2016 at 3:00pm — 6 Comments
भीतर पुराने धूल-सने मकबरे में
धुआँते, भूलभुलियों-से कमरे
अनुभूत भीषण एकान्त
विद्रोही भाव
जब सूझ नहीं कुछ पड़ता है
कुछ है जो घूमघाम कर बार-बार
नव-आविष्कृत बहाने लिए
अमुक स्थिति को ठेल…
ContinueAdded by vijay nikore on October 19, 2016 at 11:00pm — 14 Comments
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