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Saurabh Pandey's Blog – October 2014 Archive (3)

ग़ज़ल - इससे बढ़कर कोई अनर्गल क्या ? // --सौरभ

२१२२  १२१२  २२



इससे बढ़कर कोई अनर्गल क्या ?

पूछिये निर्झरों से - "अविरल क्या ?"



घुल रहा है वजूद तिल-तिल कर

हो रहा है हमें ये अव्वल क्या ?



गीत ग़ज़लें रुबाइयाँ.. मेरी ?

बस तुम्हें पढ़ रहा हूँ, कौशल क्या ?



अब उठो.. चढ़ गया है दिन कितना..

टाट लगने लगा है मखमल क्या !



मित्रता है अगर सरोवर से

छोड़िये सोचते हैं बादल क्या !



अब नये-से-नये ठिकाने हैं..

राजधानी चलें !.. ये चंबल क्या ?



चुप न…

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Added by Saurabh Pandey on October 25, 2014 at 12:00pm — 40 Comments

अँधेरी रात में जब दीप झिलमिलाते हैं (गीत) // -- सौरभ

१२१२ ११२२ १२१२ २२

सहज लगाव हृदय में हिलोड़ जाते हैं ।

अँधेरी रात में जब दीप झिलमिलाते हैं ॥



किसी उदास की पीड़ा सजल हृदय में ले

निशा निराश हुई, चुप वृथा पड़ी-सी थी

तथा निग़ाह कहीं दूर व्योम में उलझी…

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Added by Saurabh Pandey on October 21, 2014 at 5:30am — 20 Comments

दियालिया उजास दे (नवगीत) // --सौरभ

आँक दूँ ललाट पर

मैं चुम्बनों के दीप, आ..

रात भर विभोर तू

दियालिया उजास दे..



संयमी बना रहा

ये मौन भी विचित्र है

शब्द-शब्द पी

करे निनाद-ब्रह्म का वरण..…

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Added by Saurabh Pandey on October 5, 2014 at 11:30am — 34 Comments

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