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अँधेरी रात में जब दीप झिलमिलाते हैं (गीत) // -- सौरभ

१२१२ ११२२ १२१२ २२

सहज लगाव हृदय में हिलोड़ जाते हैं ।
अँधेरी रात में जब दीप झिलमिलाते हैं ॥

किसी उदास की पीड़ा सजल हृदय में ले
निशा निराश हुई, चुप वृथा पड़ी-सी थी
तथा निग़ाह कहीं दूर व्योम में उलझी
किसी करीब के होने की आस जीती थी

मगर रुकी है कहाँ ज़िन्दग़ी किसी पल भी
इसी विचार को समवेत स्वर में गाते हैं--
अँधेरी रात में जब दीप झिलमिलाते हैं !!

उतावली कोई अल्हड़ झिंझोर दे मणियाँ
कभी लगे कि झरे पारिजात अदबद कर
रसालकुंज अघाया हुआ.. मताया-सा..
कुमारियों की नरम देह झुक गयी लद कर

शकुंतला है इन्हीं वृक्ष, वन-लताओं में  
पुलक-पुकार से दुष्यंत फिर बुलाते हैं !
अँधेरी रात में जब दीप झिलमिलाते हैं !!
 
धरा के अंग पे सुन्दर लगें ये आभूषण
कभी  सुहाग  के  कुंकुम बने निखरते हैं
महावरों की लकीरों-से रच गये, या फिर-  
सुहाग-रंग छुए अंग बन-सँवरते हैं

लगे धरा ये सिहरती हुई नयी दुल्हन
’अटल रहे तेरा अहिवात..’ बोल भाते हैं !
अँधेरी रात में जब दीप झिलमिलाते हैं !!
******************
-सौरभ
(मौलिक और अप्रकाशित)

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Comment

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Comment by Rahul Dangi Panchal on November 4, 2014 at 11:46am
आदरणीय से एक सवाल है कि क्या गीत विधा भी मान्य बेहर पर लिखनी अनिवार्य है या अपनी बनायी हुई बहर पर भी लिख सकते है! क्या गीत में तुकान्त नियम भी गजल की तरह ही लागु होते है! क्रपया समझाने का कष्ट करें!

और हो सके तो गीत को समझने के लिए किसी उपयुक्त साधन भी बताने का कष्ट करें! प्लीज!
Comment by Rahul Dangi Panchal on November 4, 2014 at 11:39am
आदरणीय बहुत सुन्दर गीत है

सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on October 31, 2014 at 9:16pm

आदरणीय नीलेशजी, आप ग़ज़ल के अलावा अन्य विधाओं की रचना पर कम ही आते हैं. आपके आशीर्वाद से रचना कंतिमान हुई है. हार्दिक धन्यवाद.


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on October 31, 2014 at 9:16pm

आदरणीय सत्यनारायणजी, आपके अनुमोदन से प्रस्तुति का मान बढ़ा है. हार्दिक धन्यवाद


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on October 31, 2014 at 9:16pm

आदरणीय लक्ष्मण प्रसादजी, आपको रचना पसंद आयी, यह मुझे भी भला लगा.
हार्दिक धन्यवाद


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on October 31, 2014 at 9:15pm

आदरणीय गोपाल नारायनजी, इस हुलास से प्रस्तुति को अनुमोदित करने के लिए हार्दिक धन्यवाद. आपके अतिरेक से मुझे तनिक संकोच हो रहा है, आदरणीय. :-))


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on October 31, 2014 at 9:15pm

आदरणीय डॉ. विजय शंकरजी, प्रस्तुत गीत को आपने अनुमोदित किया. हार्दिक धन्यवाद.
सादर

Comment by Nilesh Shevgaonkar on October 22, 2014 at 2:19pm

बहुत सुंदर गीत 
शब्द शब्द गीत गा रहा है ,,गुनगुना रहा है ..
बधाई आपको 

Comment by Satyanarayan Singh on October 22, 2014 at 1:24pm

परम आ. सौरभ जी सादर

तावली कोई अल्हड़ झिंझोर दे मणियाँ 
कभी लगे कि झरे पारिजात अदबद कर 
रसालकुंज अघाया हुआ.. मताया-सा.. 
कुमारियों की नरम देह झुक गयी लद कर 

शकुंतला है इन्हीं वृक्ष, वन-लताओं में  
पुलक-पुकार से दुष्यंत फिर बुलाते हैं !
अँधेरी रात में जब दीप झिलमिलाते हैं !!
खूबसूरत एहसास की  सुन्दर अभिव्यक्ति हुई है  इस गीत के माध्यम से अतएव  हार्दिक बधाई .स्वीकार करें आदरणीय

दीपावली की अनेकानेक शुभकामनाएँ

सादर

Comment by लक्ष्मण रामानुज लडीवाला on October 22, 2014 at 12:04pm

किसी उदास की पीड़ा सजल हृदय में ले 
निशा निराश हुई, चुप वृथा पड़ी-सी थी 
तथा निग़ाह कहीं दूर व्योम में उलझी 
किसी करीब के होने की आस जीती थी 

मगर रुकी है कहाँ ज़िन्दग़ी किसी पल भी 
इसी विचार को समवेत स्वर में गाते हैं--
अँधेरी रात में जब दीप झिलमिलाते हैं !! --- दीपों की झिल्ल्मिलाती लड़ियों की सी रौशनी बिखेरती सुंदर गीत रचना के

लिए हार्दिक बधाई आदरणीय | दीपोत्सव त्यौहार की मंगल कामनाएं  

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