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Manan Kumar singh's Blog – September 2016 Archive (4)

गजल(कर गुजरते कुछ.......)

छद्मवेशी देशभक्त दोस्तों को समर्पित)

2122 2122 2122 2

***

कर गुजरते कुछ अभी तैयार बैठे हैं

देख अपनों की दशा लाचार बैठे हैं।1



दुश्मनों की नस दबाते, शोर मच जाता,

इश्क के तो ढ़ेर सब बीमार बैठे है।2



दोस्त वह खंजर चलाता आँख बेपानी,

भर रहे हामी मुए इस पार बैठे हैं।3



जीतते आये दिलों पे राज भी करते

भेदियों की भीड़ है मन मार बैठे हैं।4



फूल कितने भी खिलाये चुभ रहे काँटे

बागवाँ पहले यहाँ सब हार बैठे हैं।5



रोशनी… Continue

Added by Manan Kumar singh on September 28, 2016 at 8:34am — 13 Comments

गजल (फूलों की बात)

2122 2122 2122 2



फूल हैं खिलते निगाहें चार करते हैं,

बागवाँ पर हम बड़ा एतबार करते हैं।1



बाँटते खुशबू जमाने से रहे सब हम,

झेलते झंझा कहाँ तकरार करते हैं?2



हम बटोही प्यार के दो बोल के भूखे ,

खुशनुमा बस आपका संसार करते हैं।3



हैं विहँसते हम सदा बगिया सजाने को,

प्यास आँखों की बुझा आभार करते हैं।4



हो नहीं सकता मसल दे पंखरी कोई,

खार भी रखते बहुत हम प्यार करते हैं।5



जां लुटाने की अगर नौबत हुई तब भी,…

Continue

Added by Manan Kumar singh on September 26, 2016 at 7:00am — 6 Comments

गजल(काश मुझको....)

बहर-रमल मुसद्दस सामिन

2122 2122 2122

+++

काश मुझको भी मिला उस्ताद होता!

शाइरी का इक जहाँ आबाद होता।1



हर्फ अपने बात हर दिल की पिरोते,

तालियाँ पिटतीं बहुत इरशाद होता।2



राबिते ढ़ल काफिये मिलते जमीं से

हर बहर में प्यार का संवाद होता।3



फिर कहाँ कोई भटकता रूक्न होता,

नित नया इक शेर तब ईजाद होता।4



रूप का डंका बजाते फिर रहे सब,

हुश्न हर ताबीर से आजाद होता।5



मानती अपनी गजल कविता सुहाती,

फिर नहीं मन में… Continue

Added by Manan Kumar singh on September 15, 2016 at 8:30pm — 9 Comments

गजल(बंदिशों को तोड़कर....)

2122 2122 2122 212

बंदिशों को तोड़कर हलचल करूँगाआज भी

बात मन की बेझिझक मैं तो कहूँगा आज भी।1



फिर गयीं नजरें बहुत ही क्या हुआ कुछ गम नहीं,

आँख में बनकर सपन मैं तो रहूँगा आज भी।2



ले गये कितने बवंडर तोड़ कर कलियाँ मगर,

डाल पर इक फूल बन मैं तो सजूँगा आज भी।3



टूटती अबतक रही हैं गीत की लड़ियाँ मगर,

राग बन हमराज का मैं तो बजूँगा आज भी।4



लुट गये कितने सपन बेढ़ब फिजाओं के तले,

इक घरौंदा रेत पर फिर से रचूँगा आज भी।5



होंठ… Continue

Added by Manan Kumar singh on September 5, 2016 at 5:00am — 8 Comments

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