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मिथिलेश वामनकर's Blog – September 2015 Archive (12)

कभी मैं खेत जैसा हूँ कभी खलिहान जैसा हूँ -- (ग़ज़ल) -- मिथिलेश वामनकर

1222—1222—1222—1222

 

कभी मैं खेत जैसा हूँ, कभी खलिहान जैसा हूँ

मगर परिणाम, होरी के उसी गोदान जैसा हूँ

 

मुझे इस मोह-माया, कामना ने भक्त…

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Added by मिथिलेश वामनकर on September 27, 2015 at 9:30am — 28 Comments

ग़ज़ल :: (बह्र-ए-शिकस्ता) -- कभी ये रहा है बेहद, कभी मुख़्तसर रहा है -- मिथिलेश वामनकर

फ़'इ'लात फ़ाइलातुन फ़'इ'लात फ़ाइलातुन 

1121 - 2122 - 1121 – 2122

 

कभी ये रहा है बेहद, कभी मुख़्तसर रहा है

मेरा दर्द तो हमेशा, दिलो-जां जिगर रहा है…

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Added by मिथिलेश वामनकर on September 23, 2015 at 10:00am — 18 Comments

आज हमें होश में आने का नहीं -- (ग़ज़ल) -- मिथिलेश वामनकर

2122-- 1122 --1122 --112

 

इस तरह आज हमें होश में आने का नहीं

मुफ्त आई है मगर यार पिलाने का नहीं

 

सिर्फ रोता हुआ हर गीत सुनाने का नहीं…

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Added by मिथिलेश वामनकर on September 21, 2015 at 4:25am — 22 Comments

वो बदल जाए खुदारा बस इसी उम्मींद पर-- (ग़ज़ल)-- मिथिलेश वामनकर

2122---2122---2122---212

 

वो बदल जाए खुदारा बस इसी उम्मींद पर

हर दफा उनकी ख़ता रखते रहे ज़ेरे-नजर

 

ये इशारे मानिए दरिया बहुत गहरा…

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Added by मिथिलेश वामनकर on September 19, 2015 at 3:00am — 24 Comments

नज़र इंसान की घातक हुई क्या?-- ग़ज़ल -- मिथिलेश वामनकर

1222---1222---122

 

नज़र इंसान की घातक हुई क्या?

अभी नासाफ़ थी, हिंसक हुई क्या?

 

भरोसा जिन्दगी से उठ गया जो…

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Added by मिथिलेश वामनकर on September 17, 2015 at 4:11am — 21 Comments

ज़रा सी बात पे फिर आज मुँह फुला आया-- (ग़ज़ल) -- मिथिलेश वामनकर

 

1212--- 1122---1212---22

 

अगर नहीं था यकीं क्यों हलफ उठा आया

ज़रा सी बात पे फिर आज मुँह फुला आया

 

पहाड़ कौन सा टूटा, जो तेरी बातों…

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Added by मिथिलेश वामनकर on September 10, 2015 at 9:30am — 26 Comments

हमको तो खुल्द से भी मुहब्बत नहीं रही --- (ग़ज़ल) --- मिथिलेश वामनकर

221—2121—1221-212

 

हमको तो खुल्द से भी मुहब्बत नहीं रही

या यूं कहें कि पाक अकीदत नहीं रही

 

जाते कहाँ हरेक तरफ यार ही…

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Added by मिथिलेश वामनकर on September 9, 2015 at 9:30am — 18 Comments

मसरूफ है दुआ करने-- (ग़ज़ल) -- मिथिलेश वामनकर

1212--- 1122---1212---22

 

जरा खंरोच जो आई लगे सदा करने

कलम जो धड़ से है, जाएँ कहाँ दवा करने

 

उसे भरम है अदालत से फैसला…

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Added by मिथिलेश वामनकर on September 7, 2015 at 9:30pm — 36 Comments

बता क्या होगा?-- ग़ज़ल -- (मिथिलेश वामनकर)

2122—1122—1122—22

 

मेरी नींदों को सताने से बता क्या होगा?

इस तरह ख़ाब में आने से बता क्या होगा?

 

आज अहसास का सागर जो कहीं गुम यारों  …

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Added by मिथिलेश वामनकर on September 5, 2015 at 10:00am — 24 Comments

इसी तरह से ग़ज़ल हुई है -- (ग़ज़ल) -- मिथिलेश वामनकर

121-22---121-22---121-22---121-22

 

मेरी पुरानी जो वेदना थी वो आज थोड़ी सबल हुई है

ज़रा सी फिर आँख डबडबाई इसी तरह से ग़ज़ल हुई है

 

खुदा के अपने ये…

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Added by मिथिलेश वामनकर on September 4, 2015 at 10:00am — 30 Comments

इतना तो काम आप को करना पड़ेगा जी -- (ग़ज़ल) -- मिथिलेश वामनकर

221—2121—1221-212

 

इतना तो काम आप को करना पड़ेगा जी

जन्नत जो देखना है तो मरना पड़ेगा जी

 

माना कि बादशाहे-आसमां है वो…

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Added by मिथिलेश वामनकर on September 3, 2015 at 2:28pm — 12 Comments

जीवन उजड़ा नक्सल जैसा (गजल) -- मिथिलेश वामनकर

22---22---22---22

 

सूखा है, घर के नल जैसा

जीवन उजड़ा नक्सल जैसा

 

हुक्कामों से प्रश्न हुआ तो…

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Added by मिथिलेश वामनकर on September 1, 2015 at 9:30am — 18 Comments

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