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आज हमें होश में आने का नहीं -- (ग़ज़ल) -- मिथिलेश वामनकर

2122-- 1122 --1122 --112

 

इस तरह आज हमें होश में आने का नहीं

मुफ्त आई है मगर यार पिलाने का नहीं

 

सिर्फ रोता हुआ हर गीत सुनाने का नहीं

जिंदगी नाम है जीने का, चलाने का नहीं

 

तुमको मंगता है उजाला तो सितारों से कहो

रौशनी को, मेरे घर आग लगाने का नहीं

 

देख बिगड़ी हुई सूरत को, कहा दरपन ने

फिर कभी भीड़ में यूँ आँख दबाने का नहीं

 

यार गुस्से से पिघल जाए तो ये अच्छा है  

आँसुओं से कभी ये जुल्म गलाने का नहीं 

 

तुमको सक्सेस जो होने का तो कुछ काम करो

सिर्फ अल्लाह से इक आस लगाने का नहीं

 

गंध हो जिसमें किसी के लहू की फैली हुई

ऐसी दौलत को कभी हाथ लगाने का नहीं

 

आज बेटी ने दिया आसरा तो मैं समझा

सिर्फ बेटों के लिए हाथ उठाने का नहीं

 

फैसला आज मेरे प्यार का ऐसे होगा

आज जाने का नहीं या कभी आने का नहीं

 

मेरा सपना था इसी प्लॉट पे घर करने का

सारी दुनिया से अलग गाँव बसाने का नहीं

 

 

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(मौलिक व अप्रकाशित)  © मिथिलेश वामनकर 
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सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on December 25, 2015 at 4:11am

आदरणीय गिरिराज सर, इस प्रयास पर आपका अनुमोदन आश्वस्त करता हुआ सा है.  ग़ज़ल की सराहना और उत्साहवर्धक प्रतिक्रिया के लिए हार्दिक आभार, बहुत बहुत धन्यवाद. 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on September 23, 2015 at 7:01am

आदरनीय मिथिलेश भाई , एक नये अंदाज मे बहुत सुन्दर ग़ज़ल कही है , दिली बधाइयाँ स्वीकार कीजिये ।


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on September 22, 2015 at 11:58pm

आदरणीय कृष्ण भाई जी, ग़ज़ल पर मुखर अनुमोदन  सराहना और उत्साहवर्धक प्रतिक्रिया के हार्दिक आभार. बहुत बहुत धन्यवाद 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on September 22, 2015 at 11:57pm

आदरणीया प्रतिभा जी ग़ज़ल पर आपका मुखर अनुमोदन पाकर आनंदित हूँ. ग़ज़ल की सराहना और उत्साहवर्धक प्रतिक्रिया के हार्दिक आभार. बहुत बहुत धन्यवाद 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on September 22, 2015 at 11:56pm

आदरणीय विजय सर आपने ग़ज़ल की सराहना के साथ साथ ही बहुत बढ़िया मिसरा कहा है, आपका आभार व्यक्त करते हुए उस मिसरे पर एक शेर आपको समर्पित -

जो 'विजय' मिल गई खुशियों को,..... तो खुशियों ने कहा 

जिंदगी हंस के बिताने का है.................... रोने का नहीं

 

Comment by Krish mishra 'jaan' gorakhpuri on September 22, 2015 at 10:09pm
अहा!बहुत खूब..आ० मिथिलेश सर!नये मिज़ाज की गज़ल देख मन आनंदित हो गया!हार्दिक बधाई इस दिलकश प्रस्तुति पर!
Comment by pratibha pande on September 22, 2015 at 9:36pm

ग़ज़लों में आपकी पकड़ शानदार है , हर ग़ज़ल नयापन  लिए होती है बहुत शुभकामनाएँ और बधाई आपकोआदरणीय  मिथिलेश जी 

Comment by Dr. Vijai Shanker on September 22, 2015 at 9:28pm
सिर्फ रोता हुआ हर गीत सुनाने का नहीं
जिंदगी नाम है जीने का, चलाने का नहीं।
बहुत खूब , प्रिय मिथिलेश जी ,
जिंदगी हंस के बिताने का रोने का नहीं
बहुत बहुत बधाई , सादर।

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on September 22, 2015 at 3:08pm

आदरणीय रवि जी, ग़ज़ल के मुखर अनुमोदन,  सराहना और उत्साहवर्धक प्रतिक्रिया के हार्दिक आभार. बहुत बहुत धन्यवाद 

शहरयार साहब का शेर पढ़कर आनंद आ गया. 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on September 22, 2015 at 3:07pm

आदरणीया कांता जी, ग़ज़ल पर मुखर अनुमोदन पाकर आनंदित हूँ. ग़ज़ल की सराहना और उत्साहवर्धक प्रतिक्रिया के हार्दिक आभार. बहुत बहुत धन्यवाद 

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