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1222-1222-1222-1222

जो आई शब, जरा सी देर को ही क्या गया सूरज।
अंधेरे भी मुनादी कर रहें घबरा गया सूरज।

चमकते चांद को इस तीरगी में देख लगता है,
विरासत को बचाने का हुनर समझा गया सूरज।

उफ़क तक दौड़ने के बाद में तब चैन से सोया,
जमीं से भी जो जाते वक्त में मिलता गया सूरज।

तुम्हें रोना है जितनी देर, रो लो शाम का रोना,
मगर दीपक की बाती पर सिमट कर आ गया सूरज।

वो आईना दिखाने में बहुत मसरूफ़ थे लेकिन,
बिना बोले इधर बे-इंतिहा हंसता गया सूरज।

बहुत महंगी पड़ी मौका परस्ती बादलों को भी,
उन्हीं को चीर के जब रौशनी फैला गया सूरज।

(मौलिक व अप्रकाशित)

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Comment by Ravi Shukla on November 16, 2025 at 10:09am

आदरणीय मिथिलेश जी सबसे पहले तो इस उम्दा गजल के लिए आपको मैं शेर दर शेरों बधाई देता हूं आदरणीय सौरभ जी ने गजल के कथ्य पर अपनी विस्तृत दी है उससे भी बहुत सी जानकारियां पाठकों के सामने खुलती हैं कुछ बातें पूरी विनम्रता के साथ मैं भी कहना चाहूंगा

जो आई शब, जरा सी देर को ही क्या गया सूरज।
अंधेरे भी मुनादी कर रहें घबरा गया सूरज।

जो आई  के साथ जब आई शब पर भी विचार कीजियेगा

चमकते चांद को इस तीरगी में देख लगता है,
विरासत को बचाने का हुनर समझा गया सूरज।

उफ़क तक दौड़ने के बाद में तब चैन से सोया,
जमीं से भी जो जाते वक्त में मिलता गया सूरज।

ऊला में  ...तक दौड़ने के बाद में यहां में शब्द बाद के पश्चात अनुपयुक्त है ।

तुम्हें रोना है जितनी देर, रो लो शाम का रोना,
मगर दीपक की बाती पर सिमट कर आ गया सूरज।

सानी के मुताबिक हमें लगता है ऊला भूत काल की बात  है। अभी आपके शेर के अनुसार तुम्हें रोना है जितनी देर शाम का रोना रो लो लेकिन दीपक की बात ही पर सूरज सिमट कर आएगा ही ऐसा कथ्य है। 

बहुत महंगी पड़ी मौका परस्ती बादलों को भी,
उन्हीं को चीर के जब रौशनी फैला गया सूरज।

ऊला का लफ्ज़ भी जस्टिफाय नहीं हुआ  बादलों के अलावा यह मौका परस्ती और किसको महंगी पड़ी यह पता नहीं चल रहा ।

जैसे तीसरे शेर का भी आपके कथ्य को स्पष्ट कर रहा है। इस शेर में हमें उसकी कमी समझ आई ।सादर

यह हमारी पाठकीय प्रतिक्रिया मात्र है इस से सहमति आवश्यक नहीं है लेखककीय स्वतंत्रता सर्वोपरि है


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on October 31, 2025 at 8:54pm

आदरणीय सौरभ सर, आपको मेरा प्रयास पसंद आया, जानकार मुग्ध हूँ. आपकी सराहना सदैव लेखन के लिए प्रेरित करती है. आपने प्रत्येक शेर पर मुग्ध करती प्रतिक्रिया दी है. , वाक्यांश ’मुनादी कर रहे’ कको ठीक करता हूँ. इस सराहना और प्रेरित करती प्रतिक्रिया हेतु हार्दिक आभार, बहुत बहुत धन्यवाद .. 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on October 31, 2025 at 8:50pm

आदरणीय सतविन्द्र कुमार राणाजी, मेरे प्रयास को मान देने के लिए हार्दिक आभार. बहुत बहुत धन्यवाद 


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on October 24, 2025 at 1:03pm

सूरज के बिम्ब को लेकर क्या ही सुलझी हुई गजल प्रस्तुत हुई है, आदरणीय मिथिलेश भाईजी. वाह वाह वाह ! 

प्रत्येक शेर में गझिन भावों को करीने से बुना गया है. ऐसा कि मतला ही एक पाठक को अपने बहाव में ले लेता है. 

जो आई शब, जरा सी देर को ही क्या गया सूरज।
अंधेरे भी मुनादी कर रहें घबरा गया सूरज ... ..    क्या ही कमाल का मतला है. कमतर विचारवाले दल के छुटभइयों द्वारा मचाये जा रहे कुहराम या बवाल और चलाये जा रहे विमर्श को सशक्त शब्द मिले हैं. अलबत्ता, वाक्यांश ’मुनादी कर रहे’ होगा. .. 

चमकते चांद को इस तीरगी में देख लगता है,
विरासत को बचाने का हुनर समझा गया सूरज ... .. वाह ! किसी गुरुतर व्यक्तित्व के स्वामी के अशक्त होने पर परिवार की विकट परिस्थितियों में अन्य सदस्य द्वारा अपने कर्त्तव्य निर्वहन के लिए संलग्न रहना खूबसूरती से बाँधा गया है. भाव-विभोर करता शेर हुआ है.   

उफ़क तक दौड़ने के बाद में तब चैन से सोया,
जमीं से भी जो जाते वक्त में मिलता गया सूरज।  ...  त्वदीयं वस्तु गोविन्द, तुभ्यमेव समर्पये का सुंदर पहलू, कि सब ठीक से रहना...

तुम्हें रोना है जितनी देर, रो लो शाम का रोना,
मगर दीपक की बाती पर सिमट कर आ गया सूरज। .. क्या ही महीन भाव हैं ! दायित्व निर्वहन चिंता मात्र करने, रोने-चिल्लाने से नहीं, बल्कि अपने आपको झोंक देने से होता है. . 

वो आईना दिखाने में बहुत मसरूफ़ थे लेकिन,
बिना बोले इधर बे-इंतिहा हंसता गया सूरज। ........ वाह. अधजल गगरी छलकती ही है, भरी गगरिया चुप्पे जाये. 

बहुत महंगी पड़ी मौका परस्ती बादलों को भी,
उन्हीं को चीर के जब रौशनी फैला गया सूरज .....  कुशल, सक्षम लोगों का कौशल बहुत दिनों तक नकारा नहीं जा सकता. वह उभर कर प्रकाश में आता ही आता है. 

व्यंजना भाव का सुंदर निर्वहन करती इस बेहतरीन प्रस्तुति ने मुग्ध कर दिया, आदरणीय मिथिलेश जी. हार्दिक बधाइयाँ 

शुभातिशुभ

 

Comment by सतविन्द्र कुमार राणा on October 20, 2025 at 8:29am

जय हो, बेहतरीन ग़ज़ल कहने के लिए सादर बधाई आदरणीय मिथिलेश जी। 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on October 7, 2025 at 9:43pm

आदरणीय लक्ष्मण धामी जी मेरे प्रयास को मान देने के लिए हार्दिक धन्यवाद। बहुत-बहुत आभार। सादर

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on September 28, 2025 at 4:45am

आ. भाई मिथिलेश जी, सादर अभिवादन। बहुत सुंदर गजल हुई है। हार्दिक बधाई।

कृपया ध्यान दे...

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