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Shashi Mehra's Blog – September 2012 Archive (2)

वो लोगों के दिलों में झाँकता है

वो लोगों के दिलों में झाँकता है |

वो कुछ ज्यादा ही लंबी हाँकता है ||

चला रहता है, वो कुछ खोजने को |

वो नाहक धुल-मिटटी, फाँकता है ||

न जाने, किस जहाँ में, है वो रहता |

वो अपनी, हद कभी न लाँघता है ||

परखता है, न जाने, किस तरह वो |

कसौटी कौन सी, पे जाँचता है ||

वो साँसों कि तरह, लेता है आहें ||

वो जब चादर, ग़मों कि, तानता है ||

वो कहता है कि, हर बन्दा, खुदा है |

खुदा को, कब खुदा, वो मानता है ||

'शशि' कुछ मशवरा, उस से ही ले लो |…

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Added by Shashi Mehra on September 25, 2012 at 8:30pm — 1 Comment

वलवले

ये कैसी, अनहोनी होई |

दिल रोया, पर आँख ना रोई ||

चाहूँ लाख, जगाना उसको |

कम करे, तदबीर ना कोई || 

सब बेचारा, कह देते हैं |

जो लिखा है , होगा सोई ||

याद नहीं है, क्या बोया था |

दिल की बस्ती, बंज़र होई ||

अँधेरा है, कैसे ढूँढूँ |

यारो, अपनी किस्मत खोई ||

तन्हाई अच्छी, लगती है |

तन्हाई सा, मीत ना कोई ||

बन्ज़ारों सा, घूम रहा हूँ |

अपना पक्का, ठौर, ना कोई ||

कब अपने से, मिल पाऊँगा |

कब मेरा…

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Added by Shashi Mehra on September 21, 2012 at 11:30am — 4 Comments

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