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लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर''s Blog – August 2022 Archive (3)

निभाते रहे दुश्मनी को वो ऐसे -लक्ष्मण धामी "मुसाफिर"



१२२/१२२/१२२/१२२

***

न मन के  सहारे  रहे साथ अपने

न सुख के पिटारे रहे साथ अपने।।

*

कभी साथ देने न मझधार आयी

कि सूखे किनारे रहे साथ अपने।।

*

बहारें भले मुह फुलाती हों अब भी

खिजां  के  नजारे  रहे  साथ अपने।।

*

खुशी ने जो पाले अछूतों में गिनते

दुखों  के  दुलारे  रहे  साथ  अपने।।

*

नदी नीर मीठा लिए गुम गयी पर

समन्दर वो खारे  रहे साथ अपने।।

*

भले आज फैली अमा हर तरफ हो

कभी  चाँद  तारे   रहे  साथ …

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Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on August 29, 2022 at 9:30pm — 8 Comments

सिन्दूर कह न सिर्फ सजाने की चीज है -लक्ष्मण धामी "मुसाफिर"

सिन्दूर कह न सिर्फ सजाने की चीज है

पुरखे बता गये हैं निभाने की चीज है।।

*

इससे बँधा है जन्मों का रिश्ता जमाने में

हक और सिर्फ प्रीत से पाने की चीज है।।

*

भरते ही माग इससे जो विश्वास जागता

भूली जो पीढ़ी उसको बताने की चीज है।।

*

मन में जगाता प्रेम समर्पण के भाव को

केवल न रीत सोच  निभाने की चीज है।।

*

इससे हैं मिटाती दूरियाँ केवल न देह की

ये दो दिलों को पास में लाने की चीज है।।

*

छीनो न भाव इसका भले आधुनिक हुए

ये तो जमीर नर …

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Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on August 23, 2022 at 6:18am — 5 Comments

कान्हा कहाँ गये -लक्ष्मण धामी "मुसाफिर"

२२१/२१२१/२२१/२१२

*

फिरती स्वयम्  से  पूछती  राधा  कहाँ गये

भक्तों के दुख को भूल के कान्हा कहाँ गये/

*

होने लगा जगत से है नित नाश धर्म का

आने का फिर से भूल के वादा कहाँ गये/

*

गोकुल हो मथुरा द्वारका कन्सों का राज है

जन-जन से ऐसे  तोड़  के  नाता कहाँ गये/

*

रिश्ते जहाँ में छल के ही आवास अब बने

होता सभा  में  मान  का  सौदा  कहाँ गये/

*

आओ मिटाने पीर को जन-जन पुकारता

मुरली छिपाये  लोक  के  राजा कहाँ…

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Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on August 19, 2022 at 9:34am — 3 Comments

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