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Dr.Vijay Prakash Sharma's Blog – July 2014 Archive (5)

लाजवन्ती

प्रिया

कहती हो

कहाँ रही

नवेली.

अब कहाँ कजरा

चमेली का गजरा

छूई-मुई

लाजवन्ती.

सुबह का नास्ता

बच्चों का स्कूल

प्रीत गए भूल.

बनाकर टिफिन

घर से ऑफिस

ऑफिस से घर

भागदौड़.

तुम नहीं जानती

कितना सुखद लगता है

आज भी तुम्हारा रूप

किचन में

आँचल से पसीने पोंछती

तुम -अद्भुत सजती हो .

जब अपने को

सहज ही सहेजकर

ऑफिस के लिए

निकलती हो

खुदा कसम

नवेली ही लगती…

Continue

Added by Dr.Vijay Prakash Sharma on July 19, 2014 at 5:30pm — 8 Comments

सहर

बहुत रोया मैं,
पड़ोसी चाची के मर जाने पर
गाँव से शहर जाने पर
हाल के दंगे में
आग देखकर

डर जाने पर
खुद को लूटा के

घर जाने पर
आंसुओं ने साथ छोड़ दिया
नहीं रोया मैं,
माँ के मर जाने पर,
वो 

हर सहर के साथ

हॅसते देखना चाहती थी.
विजय प्रकाश शर्मा
मौलिक व अप्रकाशित

Added by Dr.Vijay Prakash Sharma on July 10, 2014 at 9:50pm — 12 Comments

सपनो का गाँव,

सपनो का गाँव,

पीपल की छावो,

नदी का वह तट ,

नहाती जहाँ झट -पट

किनारे के लोग कभी

नहीं देखते थे एकटक .

बदल गए वो भाव

बदल गया गाँव,

झूमर औ गीत गए

रिश्ते अब रीत गए

लक्ष्मी जब भाग गई

आँखों की लाज गई

अब दीदे हुए बेशर्म

गाँव का माहौल गर्म

आतंक, भूख , भय

राजनीती देती प्रश्रय

सुख गए अब खेत,

माटी बन गई रेत,

भागे सब शहर को

कौन करे अब सेत.

पसर रहा है मौन

जिम्मेवार है कौन?

विजय प्रकाश…

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Added by Dr.Vijay Prakash Sharma on July 4, 2014 at 11:47pm — 15 Comments

तख़्त

तख़्त के साथ -साथ

तख्तियां बदलती हैं.

वक़्त के साथ -साथ

सख्तियां बदलती हैं.

सत्ता के साथ- साथ

चाप्लूसियां बदलती हैं.

अल्हडों के साथ-साथ

फब्तियां बदलती हैं.

धर्मों के साथ-साथ

भ्रांतियां बदलती हैं.

भोंहों के साथ-साथ

भृकुटियां बदलती हैं.

सन्दर्भों के साथ-साथ

अभिव्यक्तियाँ बदलती हैं.

सम्हालते सम्हालते

परिस्थितयां बदलती हैं.

कन्धों के साथ-साथ

अब अर्थियां बदलती है.

विजय प्रकाश शर्मा

मौलिक व…

Continue

Added by Dr.Vijay Prakash Sharma on July 2, 2014 at 12:31am — 6 Comments

कागज की नाव

मन के भावो को
कल्पना की कलम से
कोरे कागज़ पर
उतारता हूँ.
शब्दों की  आड़ में,
चिंता के झाड़ से
बचाई "संवेदना" को
संवारता हूँ,
कागज की नाव पर
सपनो के सागर में
सच की पतवार लिए
हिलकोरे खाता हूँ.
डूबना -उतराना तो
खेल है जीवन का
जाने क्या आश लिए
क्षितिज तक जाता हूँ.

विजय प्रकाश शर्मा.
मौलिक व अप्रकाशित

Added by Dr.Vijay Prakash Sharma on July 1, 2014 at 11:00am — 14 Comments

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