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Satish mapatpuri's Blog – June 2010 Archive (8)

मिलन का प्रथम प्रहर

चारुलता सी पुष्प सुसज्जित, चंद्रमुखी तन ज्योत्स्ना.

खंजन- दृग औ मृग- चंचलता, मानों कवि की कल्पना.

उन्नत भाल -चाल गजगामिनी, विधि की सुन्दर रचना है.

मंद समीर अधीर छुवन को, सच या सुंदर सपना है.

निष्कलंक -निष्पाप ह्रदय में, पिया-मिलन की कामना.

खंजन-दृग औ मृग-चंचलता, मानों कवि की कल्पना.

तना-ओट से प्रिय को निहारा, नयन उठे और झुक भी गए.

प्रिय- प्रणय की आस ह्रदय में, कदम उठे और रुक भी गए.

थरथर कांपे होंठ हुआ जब, प्रिय से उसका सामना.

खंजन-दृग औ मृग-चंचलता,… Continue

Added by satish mapatpuri on June 29, 2010 at 1:44pm — 2 Comments

ह्रदय की कोमलता मत खो देना.

जग की कटुता देख, ह्रदय की कोमलता मत खो देना.

मधुमास सुबास सुमन तन की, हर इक सांसों में भर देना.

तेरे होठों की लाली से, उषा का अवतरण हुआ.

तेरी जुल्फों की रंगत से, ज्योति का अपहरण हुआ.

अपने खंजन- नयन में रम्भे, अश्रु कभी मत भर लेना.

मधुमास सुबास सुमन तन का, हर इक साँसों में भर देना.

पाता है रवि रौनक तुमसे, चाँद- सितारे शीतलता.

पवन सुगंध- हिरण चंचलता, रसिक - नयन को मादकता.

जग को मिलता प्राण तुम्हीं से, तुम्हे जगत से क्या लेना.

मधुमास सुबास सुमन तन का,… Continue

Added by satish mapatpuri on June 23, 2010 at 3:53pm — 4 Comments

बेवफा तुमको कैसे कहें.

तेरे प्यार में दर्द लाखों सहें.

मगर बेवफा तुमको कैसें कहें.

जिन्हें प्यार से तुमने चुमा कभी.

उन्हीं आँखों से गम का दरिया बहे.

मगर बेवफा तुमको कैसे कहें.

अब भी हमें ऐसा लगता अक्सर.

तुम्हीं सामने से चले आ रहे.

मगर बेवफा तुमको कैसे कहें.

टूटे हुए दिल की है ये सदा.

जफा करने वाले सदा खुश रहें.

मगर बेवफा तुमको कैसे कहें.

मापतपुरी की यही एक ख्वाहिश.

किसी मोड़ पे वो ना फिर से मिलें.

मगर बेवफा तुमको कैसे कहें.

गीतकार- सतीश… Continue

Added by satish mapatpuri on June 21, 2010 at 4:01pm — 5 Comments

ये कैसा शरारा है.

दरिया में ही ख़ाक हुए, ये कैसा शरारा है.
साहिल पे ही डूब गए, ये कैसा किनारा है.
यहाँ छांव जलाती है,मुस्कान रुलाती है.
रातों में खुद को खुद की ही, परछाईं डराती है .
ये कौन सी दुनिया है, ये कैसा नज़ारा है.
साहिल पे ही डूब गए, ये कैसा किनारा है.
बीच भंवर में अटक गए, मंजिल से हम भटक गए.
वक़्त ने ऐसा पत्थर फेंका, सारे सपने चटक गए.
मापतपुरी को अब बस, मालिक का सहारा है.
साहिल पे ही डूब गए, ये कैसा किनारा है
गीतकार- सतीश मापतपुरी
मोबाइल- 9334414611

Added by satish mapatpuri on June 18, 2010 at 11:12am — 5 Comments

जाने क्यों तेरी याद आती.

अम्बर के वातायन से जब चाँद झांकता है भू पर, .

जाने दिल में क्यों हूक उठती - जाने क्यों तेरी याद आती.

स्वप्न संग कोमल शैय्या पर जब सारी दुनिया सोती.

किसी आम्र की सुघर शाख से कोकिल जब रसगान छेड़ती.

पागल पवन गवाक्ष- राह से ज्योंही आकर सहलाता,

तेरे सहलाए अंगों में जाने क्यों टीस उभर आती.

जाने दिल में क्यों हूक उठती- जाने क्यों तेरी याद आती.

बीते हुए पल का बिम्ब देख रजनी की गहरी आँखों में.

एक दर्द भयानक उठता है दिल पर बने हुए घावों में.

घावों से यादों का… Continue

Added by satish mapatpuri on June 14, 2010 at 4:31pm — 6 Comments

महाभारत- सार

राजा और दरबार की, परलोक की-संसार की.

गाथा है भगवान् और इंसान के व्यवहार की.

शाप की-अभिशाप की, अनुराग की-वैराग की.

घात की-आघात की, कहीं छल- कपट-प्रतिघात की.

मिलन की-वियोग की, दुर्योग की- संयोग की.

नीति की-कुनीति की, कहीं रीति की- राजनीति की.

बात ये आचार की, विचार की- संस्कार की.

गाथा है भगवान् और इंसान के व्यवहार की.

ज़िन्दगी की- काल की, कहीं भूत की- बेताल की.

शास्त्र की- शास्त्रार्थ की, कहीं जादुई ब्रम्हास्त्र की.

नाथ की- अनाथ की, कहीं बात की-… Continue

Added by satish mapatpuri on June 11, 2010 at 12:30pm — 4 Comments

मानवता का धरोहर धरहरा

बिहार के मुख्यमंत्री श्री नीतीश कुमार ६ जून को भागलपुर के नवगछिया प्रखंड में धरहरा गाँव में गए थे. इस गाँव की परम्परा उन्हें वहाँ खींच ले गयी थी. मुझे याद है, मैं अपनी एक कहानी में लिखा था कि परम्परा इंसान के लिए बनी है - इंसान परम्परा के लिए नहीं बना है. धरहरा गाँव की परम्परा अदभुत है, मैं सलाम करता हूँ इस रिवाज़ को. सचमुच यह परम्परा इंसान के लिए बनी है. इस गाँव में बेटी के जन्म लेने पर पेड़ लगाने की परम्परा है. बेटी और पर्यावरण के प्रति इस गाँव के लोगों का प्यार वाकई सराहनीय है. इस गाँव के… Continue

Added by satish mapatpuri on June 8, 2010 at 4:23pm — 4 Comments

कल्पना

ऐ कवि-शायर! कहाँ तुम छिप कर बैठे हो. ज़रा बाहर निकल कर देख तेरी कल्पना क्या है.

कहाँ निर्भीक वह यौवन, जिसे तुम शोख कहते हो.

कहाँ जलता हुआ सौन्दर्य, जिसको ज्योति कहते हो .

कहाँ कंचनमयी काया, कहाँ है जुल्फ बादल सा.

किधर चन्दन सा है वह तन, कहाँ है नैन काजल सा.

हाँ देखा है सड़क पर शर्म से झुकती जवानी को, सुना कोठे की मैली सेज पर लुटती जवानी को.

इसी मजबूर यौवन पर लगाकर शब्द का पर्दा, सच्चाई को छिपाने का तेरा यह बचपना है क्या.

ज़रा बाहर निकल कर देख तेरी कल्पना है… Continue

Added by satish mapatpuri on June 7, 2010 at 4:56pm — 7 Comments

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