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मिलन का प्रथम प्रहर

चारुलता सी पुष्प सुसज्जित, चंद्रमुखी तन ज्योत्स्ना.
खंजन- दृग औ मृग- चंचलता, मानों कवि की कल्पना.
उन्नत भाल -चाल गजगामिनी, विधि की सुन्दर रचना है.
मंद समीर अधीर छुवन को, सच या सुंदर सपना है.
निष्कलंक -निष्पाप ह्रदय में, पिया-मिलन की कामना.
खंजन-दृग औ मृग-चंचलता, मानों कवि की कल्पना.
तना-ओट से प्रिय को निहारा, नयन उठे और झुक भी गए.
प्रिय- प्रणय की आस ह्रदय में, कदम उठे और रुक भी गए.
थरथर कांपे होंठ हुआ जब, प्रिय से उसका सामना.
खंजन-दृग औ मृग-चंचलता, मानों कवि की कल्पना.
नयन-कोर से रह-रह बहके, धार कुंवारे काजल की.
कंधे से रह-रह कर कटि तक , सरके अल्हड़ आँचल भी.
प्रिय ने लिया आलिंगन में तब, पुरी(पूरी)हुई चिर साधना.
खंजन-दृग औ मृग-चंचलता,मानों कवि की कल्पना.
गीतकार-सतीश मापतपुरी
मोबाइल- 9334414611

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मुख्य प्रबंधक
Comment by Er. Ganesh Jee "Bagi" on July 5, 2010 at 6:06pm
Satish Bhaiya aap key lekhani ka koi saani nahi hai, aap har bidha mey likh letey hai, bahut sunder rachna , eeswar aap ki kalam ko shakti dey , jai hoooooooo

प्रधान संपादक
Comment by योगराज प्रभाकर on June 30, 2010 at 7:20pm
वाह वाह वाह सतीश भाई - बहुत खूब, आनंद आ गया आपका ये गीत पढ़कर ! समा बंद दिया आपकी इस काव्य प्रस्तुति ने ! श्रृंगार रस की चाशनी में डूबे हुए इस गीत की हर पंक्ति स्वयं गाती हुई प्रतीत हो रही है ! भाषा, भाव, अभिव्यक्ति और प्रवाह समेत हरेक दृष्टीकोण से भी यह एक निहायत ही सफल रचना है ! में तह-ए-दिल से आपको मुबारकबाद देता हूँ !

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