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अगर पूर्वजों के सहारे न होते .

अगर रंग - बिरंगे ये नारे न होते.
तो फिर हम भी इतने बेचारे न होते .
बस बातों के मरहम से भर जाते शायद .
अगर ज़ख्म दिल के करारे न होते .
भला किसकी हिम्मत सितम ढा सके यूँ .
अगर हम जो आदत बिगाड़े न होते .
कहीं ना कहीं से तो शह मिल रहा है .
निर्भया के बसन यूँ उतारे न होते .
मिट जाती  कब की  ये रस्मोरिवाज़ें .
अगर पूर्वजों के सहारे  न होते .
  
मौलिक और अप्रकाशित
सतीश मापतपुरी

Views: 470

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Comment by pratibha pande on September 21, 2015 at 6:35pm

बहुत सशक्त रचना ,थोड़े में में काफी कुछ कह गई ,बधाई आपको आदरणीय सतीश जी 

Comment by amod shrivastav (bindouri) on September 21, 2015 at 2:30pm
वाह सर नमन
Comment by Sushil Sarna on September 21, 2015 at 2:15pm

मिट जाती कब की ये रस्मोरिवाज़ें .
अगर पूर्वजों के सहारे न होते .
… बिलकुल सटीक बात कही है आपने आदरणीय   satish mapatpuri जी । आज भी कई निर्भयाओं के बसन दरिंदगी से लथपथ हैं। ख़बरों से अखबार लबालब हैं। एक आह भरते हैं ,चर्चा करते हैं ,दो चार गालियां देकर अपने मन की भंडास निकाल चैन से सो जाते हैं। बस यहीं तक सब कुछ होता है और फिर वही अगले पल ,अगले दिन,अगली रात ,अगली खबर में वही सब होता रहता है .... अगर ये संस्कार न बचे होते ये रस्मोरिवाज न बचे होते तो शायद ये शर्मिंदगी भी न बची होती। बहरहाल आपकी इस प्रस्तुति के लिए आपको दिल से दाद और _/\_

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