For any Query/Feedback/Suggestion related to OBO, please contact:- admin@openbooksonline.com & contact2obo@gmail.com, you may also call on 09872568228(योगराज प्रभाकर)/09431288405(गणेश जी "बागी")

Manan Kumar singh's Blog – June 2016 Archive (7)

गजल(आ गये फिर ...)

2122 22 2

आ गये फिर गिरगिट जी
शुरू हुई अब गिट-पिट जी।1

रंग बदले कितने सब
हो गये हैं अब हिट जी।2

माप कोई जूते की
पाँव इनके हैं फिट जी।3

ढ़ाल लिया सबको शीशे
इस कला के डी.लिट. जी।4

राह इनकी रूकती कब
पास पड़े सब परमिट जी।5

रोशनी के ठेके हैं
बन गये हैं सर्किट जी।6

पास होते हरदम ही
काम आती बस चिट जी।7
मौलिक व अप्रकाशित@मनन

Added by Manan Kumar singh on June 30, 2016 at 7:10am — 2 Comments

गजल (महफिल सजा हम आज ...)

महफिल सजा हम आज तक बैठे हुए

महबूब तो हैं बेवजह उखड़े हुए।1



अपनी वफा पे ढ़ा गये जुल्मो सितम

मुड़कर जरा देखा नहीं चलते हुए।2



आसान उनकी राह हमसे हो गयी

मुश्किल हुई अपनी चले गाते हुए।3



मौसम गया है लोढकर सारा शुकूं

बेकस हुए पादप तने बिखरे हुए।4



कसमस कथाएँ झेलती कलिका रही

बनठन चले हैं आज वे निखरे हुए।5



बहतीं कहाँ खुलकर हवाएँ अब यहाँ

हँसते हुए तारे अभी सहमे हुए।6



रूकता कहाँ बेखौफ कातिल मनचला

अंदाज…

Continue

Added by Manan Kumar singh on June 27, 2016 at 11:00pm — 6 Comments

गजल(आजकल मन लग रहा.....)

आजकल मन लग रहा नक्कारखाना हो गया

कुर्सियों के खेल में सच भी फसाना हो गया।1



योग का मतलब अभी तक जोड़ना समझा गया

सोच की बलिहारियाँ अब तो घटाना हो गया।2



कर रहा परहेज जिससे चल रहा था बावरा

गर्ज एेसी पड़ गयी फिर गर लगाना हो गया।3



घूँघटों की ओट से ही चल रहे थे तीर सब

बह गयी ऐसी हवा मुखड़ा दिखाना हो गया।4



शब्द साधे थे कभी जिनको निशाना कर यहाँ

आज उनके पाँव में कैसे सिढ़ाना हो गया।5



तुम नशे में चल रहे हो, मैं नशा करता… Continue

Added by Manan Kumar singh on June 23, 2016 at 12:08pm — 10 Comments

गजल(दीप बन जलता रहा हूँ.....)

दीप बन जलता रहा हूँ रात-दिन
रोशनी बिखरा रहा हूँ रात-दिन।1

जब अचल मन का पिघलता है कभी
नेह बन झरता रहा हूँ रात-दिन।2

फिर उबलता है समद निज आग से
मेह बन पड़ता रहा हूँ रात-दिन।3

कामनाएँ जब कुपित होकर चलीं
देह बन ढ़हता रहा हूँ रात-दिन।4

व्योम तक विस्तार का कैसा सपन!
मैं 'मनन' करता रहा हूँ रात-दिन।5
मौलिक व अप्रकाशित@मनन

Added by Manan Kumar singh on June 20, 2016 at 11:00am — 14 Comments

गजल(धूप का मंजर बला था)

2122 2122



धूप का मंजर बला था

साथ पर साया चला था।1



आज जितना तब कहाँ यह

छाँव का आलम खला था।2



सच कहा है घर हमेशा

खुद चिरागों से जला था।3



क्यूँ मिटाने पर तुले अब

बच गया जो अधजला था।4



बातियों का नेह बहकर

हो गया तब जलजला था!5



स्वेद सिंचित हो गयी भू

पेड़ तब कोई पला था।6



रंग सबके मिल गये थे

इक तिरंगा तब फला था।7



रश्मियों के प्रेम-रस पग

जड़ हिमालय भी गला था।8



कट रहे हम… Continue

Added by Manan Kumar singh on June 16, 2016 at 11:00pm — 6 Comments

गीतिका (आनंदवर्धक छंद)

2122 2122 212

दो कदम आगे बढ़ा कर देखिये

अब जरा नजदीक आकर देखिये।1



जो सुलगती है रही तबसे यहाँ

आग वह फिर से जला कर देखिये।2



सोलहों आने खरा अपना कनक

जो लगे अब भी तपा कर देखिये।3



खनखनाता मैं रहा कितना कहूँ

अब नहीं फिर से बजा कर देखिये।4



देख लेंगे लोग बस डरते रहे

जी करे नजरें बचा कर देखिये।5



चल चुके अबतक बहुत जाने-जिगर

पग कभी मुझसे मिला कर देखिये।6



हो रहे हैं बेखबर फिर बेवजह

फासले कुछ तो मिटाकर… Continue

Added by Manan Kumar singh on June 14, 2016 at 7:03am — 11 Comments

गजल(आग जंगल में लगी.....)

2122 2122 212



आग जंगल में लगी बुझती कहाँ

तीलियों-सी रौ समंदर की कहाँ।1



रस धरा का पी रहे बरगद खड़े

लग रहा है जिंदगी यूँ जी कहाँ।2



लाज ढ़कने का उठा बीड़ा लिया

तार होता है वसन जो सी कहाँ।3



अब लजाने का जमाना लद गया

यह नयन बहता जुबानी भी कहाँ।4



साथ चलने का भरा था दम कभी

दिख रहा मझधार में वह ही कहाँ।5



आँसुओं में घुल गये कितने शिखर

है पिघलता आज भी यह जी कहाँ।6



सुन रहा कब से जमाने की सदा

कह… Continue

Added by Manan Kumar singh on June 5, 2016 at 4:00pm — 6 Comments

कृपया ध्यान दे...

आवश्यक सूचना:-

1-सभी सदस्यों से अनुरोध है कि कृपया मौलिक व अप्रकाशित रचना ही पोस्ट करें,पूर्व प्रकाशित रचनाओं का अनुमोदन नही किया जायेगा, रचना के अंत में "मौलिक व अप्रकाशित" लिखना अनिवार्य है । अधिक जानकारी हेतु नियम देखे

2-ओपन बुक्स ऑनलाइन परिवार यदि आपको अच्छा लगा तो अपने मित्रो और शुभचिंतको को इस परिवार से जोड़ने हेतु यहाँ क्लिक कर आमंत्रण भेजे |

3-यदि आप अपने ओ बी ओ पर विडियो, फोटो या चैट सुविधा का लाभ नहीं ले पा रहे हो तो आप अपने सिस्टम पर फ्लैश प्लयेर यहाँ क्लिक कर डाउनलोड करे और फिर रन करा दे |

4-OBO नि:शुल्क विज्ञापन योजना (अधिक जानकारी हेतु क्लिक करे)

5-"सुझाव एवं शिकायत" दर्ज करने हेतु यहाँ क्लिक करे |

6-Download OBO Android App Here

हिन्दी टाइप

New  देवनागरी (हिंदी) टाइप करने हेतु दो साधन...

साधन - 1

साधन - 2

Latest Blogs

Latest Activity

रामबली गुप्ता posted a blog post

कर्मवीर

आधार छंद-मनहरण घनाक्षरी सुख हो या दुख चाहें रहते सहज और, जग की कठिनता से जो न घबराते हैं। स्थिति…See More
18 hours ago
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' commented on Saurabh Pandey's blog post नवगीत - भैंस उसी की जिसकी लाठी // सौरभ
"आ. भाई सौरभ जी, सादर अभिवादन। बहुत सुंदर और समसामयिक नवगीत रचा है आपने। बहुत बहुत हार्दिक बधाई।"
yesterday
Admin replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-130 (विषय मुक्त)
"स्वागतम"
yesterday
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' posted a blog post

दोहा पंचक - आचरण

चाहे पद से हो बहुत, मनुज शक्ति का भान। किन्तु आचरण से मिले, सदा जगत में मान।। * हवा  विषैली  हो …See More
yesterday
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-187
"आ. भाई तिलक राज जी, सादर अभिवादन। गजल पर उपस्थिति, स्नेह व उत्साहवर्धन के लिए हार्दिक आभार। 9, 10…"
yesterday
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-187
"आ. भाई दयाराम जी, सादर अभिवादन। गजल का प्रयास अच्छा हुआ है। कुछ मिसरे और समय चाहते है। इस प्रयास के…"
yesterday
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-187
"आ. भाई जयहिंद जी, सादर अभिवादन। गजल का प्रयास अच्छा हुआ है। आ. भाई तिलक राज जी के सुझाव से यह और…"
yesterday
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-187
"आ. भाई अजय जी, प्रदत्त मिसरे पर गजल का प्रयास अच्छा हुआ है। हार्दिक बधाई।"
yesterday
Chetan Prakash replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-187
" आदरणीय तिलक राज कपूर साहब,  आप मेरी प्रस्तुति तक आये, आपका आभारी हूँ।  // दीदावर का…"
yesterday
Chetan Prakash replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-187
"आ. भाई लक्ष्मण सिंह धानी ' मुसाफिर' साहब हौसला अफज़ाई के लिए  आपका बहुत-बहुत…"
yesterday
Dayaram Methani replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-187
"आपने खत लिखा उसका ही असर है साईंछोड़ दी अब बुरी संगत की डगर है साईं धर्म के नाम बताया गया भाई…"
yesterday
अजय गुप्ता 'अजेय replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-187
"ग़ज़ल पर अपनी बारीक़-नज़र से टिप्पणी करने के लिए आपका आभार आदरणीय तिलकराज जी।  एक प्रश्न है: इस…"
yesterday

© 2026   Created by Admin.   Powered by

Badges  |  Report an Issue  |  Terms of Service