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Mohammed Arif's Blog – June 2017 Archive (5)

धीरे-धीरे नदियाँ रेत बन गईं / कविता

धीरे-धीरे

नदियाँ रेत बन गईं

हरे-भरे खेतों में

ऊँची-ऊँची

अट्टालिकाएँ तन गईं

घरों में अनबन की

दीवारें खड़ी हो गईं

जीते जी बूढ़ी माँ

भुखमरी की निशानी बन गईं

मौसम सनकी

पागल जैसे हो गए

बारिश अब दूर की कौड़ी हो गई

देश

किसान आत्म हत्या का

रोज़ उत्सव मना रहा है

सरकार की

झूठी सफलताओं में

करोड़ों बहाए जा रहे हैं

सरकारी

आँकड़ों में

ग़रीबी रोज़ घट रही है

सरकार की

उद्योगपतियों के साथ

अच्छी पट रही… Continue

Added by Mohammed Arif on June 25, 2017 at 9:30am — 10 Comments

पिता (पितृ दिवस विशेष)

पिता संबल है , सहारा है ,
पिता आहुति है , उजियारा है ।
पिता साहस है , आधार है ,
पिता ग़लतियों पर वार है ।
पिता बच्चों का संसार है ,
पिता कुसंग को ललकार है ।
पिता समाज पर उपकार है ,
पिता सच्चाई की पुकार है ।
मौलिक एवं अप्रकाशित ।

Added by Mohammed Arif on June 17, 2017 at 10:58pm — 4 Comments

मुक्तक

(1) कुछ लोग ये चमन जला रहे हैं,
मज़बूर का बदन जला रहे हैं,
थमा के हाथों में हथियार वो,
ख़ुशियों भरा वतन जला रहे हैं ।
(2)संस्कारों का अब पतन हो रहा,
व्याभिचार के घर हवन हो रहा,
अनशन, भूख हड़ताल से हारा,
जीते जी किसान दफ़न हो रहा ।
(3)परिंदों के लिये जहान कहाँ है,
मुहब्बत करना आसान कहाँ है,
सभी ग़मों के समंदर में डूबे,
चेहरों पे अब मुस्कान कहाँ है ।
मौलिक एवं अप्रकाशित ।

Added by Mohammed Arif on June 12, 2017 at 11:30am — No Comments

माँ

(1) इबादत ,भक्ति और संवाद है माँ,
कोमल,निश्छल और निर्विवाद है माँ,
दुखों की गठरी कांधों पे ढोहती,
ममता की वर्षा से आबाद है माँ ।
(2)रोशनी, दीपक कभी राहत है माँ,
घरेलू नुस्खा कभी हिक़मत है माँ,
लय,छंद,गति,पाठ कभी शब्द साग़र,
संबल-सहारा कभी चाहत है माँ ।
(3)शीतल छाया कभी सहूलत है माँ,
आँसू ,सिसकी कभी हिदायत है माँ,
पंचतंत्र, जातक कथाओं-सी सीख,
घरेलू झगड़ों की अदालत है माँ ।
मौलिक एवं अप्रकाशित ।

Added by Mohammed Arif on June 7, 2017 at 12:05pm — 13 Comments

बेटियाँ (मुक्तक)

(1)क़ुदरत की इनायत हैं बेटियाँ
माँ-बाप की चाहत हैं बेटियाँ
सदा सपनों को करती साकार
हर घर की ज़रूरत हैं बेटियाँ ।
(2)राहें नई बना रही हैं बेटियाँ
सपनें नये सजा रही हैं बेटियाँ
कीर्तिमानों के शिखरों को छू रही
विमानों को उड़ा रही हैं बेटियाँ ।
मौलिक एवं अप्रकाशित ।

Added by Mohammed Arif on June 1, 2017 at 9:06pm — 11 Comments

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