अनजाना उन्माद
मिलते ही तुमसे हर बार
नीलाकाश सारा
मुझको अपना-सा लगे
बढ़ जाए फैलाव चेतना के द्वार
कण-कण मेरा पल्लवित हो उठे
कि जैसे नए वसन्त की नई बारिश
दूर उन खेतों के उस पार से ले आती
भीगी मिट्टी की नई सुगन्ध
कि जैसे कह रही झकझोर कर मुझसे ....
मानो मेरी बात, तुम जागो फिर एक बार
सुनो, आज प्यार यह इस बार कुछ और है
और तुम ...…
ContinueAdded by vijay nikore on May 9, 2021 at 2:30pm — 2 Comments
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