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Umesh katara's Blog – May 2015 Archive (4)

अदालत ने मेरा क़ातिल मुझे ठहरा दिया साहिब

1222 1222 1222 1222

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मुहब्बत है कभी जिसने मुझे कहला दिया साहिब

मगर फिर घाव उसने ही बहुत गहरा दिया साहिब 



जरूरत ही नहीं होती मुहब्बत में व़फाओं की 

के बच्चों की तरह उसने मुझे बहला दिया साहिब



सड़क पर भूख से बेचैन माँ आँसू बहाती है

निवाला बेटे को जिसने ,कभी पहला दिया साहिब

 

मुहब्बत मिट नहीं पायी दीवारों में चुनी फिर भी

रक़ीबों ने जमाने से बहुत पहरा दिया साहिब



बहुत छेड़ा है दुनिया ने खुदा की पाक…

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Added by umesh katara on May 20, 2015 at 4:47pm — 10 Comments

ग़ज़ल -उमेश कटारा

2122  2122 2122

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मर्ज बढ़ता जा रहा अब क्या रखा है

बेअसर होती दवा अब क्या रखा है



ढ़ूँढ ले अब हम सफर कोई नया तू 

मुस्करादे कब कज़ा अब क्या रखा है



रच रहे हम साजिशें इक दूसरे को 

साथ चलने में बता अब क्या रखा है



साथ आना जाना भी क्यों महफिलों में 

बन्द कर ये सिलसिला अब क्या रखा है



शहर पूरा है, मगर आया नहीं तू

बिन मिले ही मैं चला अब क्या रखा है



उमेश कटारा

मौलिक व…

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Added by umesh katara on May 9, 2015 at 9:52am — 13 Comments

रेल की पटरी जैसे चलती ,साथ चले हैं हम दोनों

पग पग तेरा मान करूँ 
अपमान मेरा मत कर तू भी
एक दिन तो सबको मरना है
अभिमान जरा मत कर तू भी
जीवन की आँख मिचौली में
ठहरूँ पल भर मैं पलक तले 
क्या है भरोसा कल सुबह तक 
कौन बचे और कौन जले
कौन मिलेगा बीच सफर में
साथ मेरे ही चलता जा
आयू भी आधी निकल गयी 
हाथ मले तो मलता जा
इक दूजे को देते रहें है
जाने क्यों हम गम दोनों
रेल की पटरी जैसे चलती
साथ चले हैं हम दोनों

उमेश कटारा
मौलिक व अप्रकाशित




Added by umesh katara on May 7, 2015 at 7:20am — 8 Comments

ग़ज़ल --उमेश-------------पत्थरों के शहर में हुआ हादसा

बन्द कर दो सितम अब खुदा के लिये

जुल्म कितना करोगे अना के लिये



कत्ल करदे मगर यूँ न बदनाम कर

हाथ उठने लगे हैं दुआ के लिये



इस कदर मुफलिसी दे न मेरे खुदा

पास पैसे न हों जब दवा के लिये



चींखती रह गयी बेगुनाही मेरी

है गुनाह भी जरूरी सजा के लिये



बाद जाने के तेरे बचा कुछ नहीं

जी रहा हूँ फ़कत मैं क़जा के लिये



पत्थरों के शहर में हुआ हादसा

मर गया इश्क देखो व़फा के लिये



उमेश कटारा

मौलिक व अप्रकाशित…

Continue

Added by umesh katara on May 3, 2015 at 9:00am — 10 Comments

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