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सतविन्द्र कुमार राणा's Blog – May 2017 Archive (5)

कुण्डलिया

जग कर रमलू जी जपें,राम नाम के बोल

कुल्ला करने के लिए,नल देते हैं खोल

नल देते हैं खोल,भूल गए बन्द करना

जल बहता है व्यर्थ,उन्हें क्यों इससे डरना

सतविन्दर कविराय,टैंक ने लिया उन्हें ठग

साबुन चिपकी गात,हाथ में है खाली जग





बात पते की एक है,सुन लो! मेरे पास

कुछ भी तब भाता नहीं,दिल हो अगर उदास

दिल हो अगर उदास,जहाँ की खुशियाँ सारी

देती दुख ही हाय!, बनीं कंटक की डारी

सतविन्दर कविराय,उठाओ दुख का ढाबा

दिन जीवन के चार,ख़ुशी से काटो… Continue

Added by सतविन्द्र कुमार राणा on May 25, 2017 at 11:30pm — No Comments

किसी मरते को जीने का वहाँ अधिकार हो जाए(तरही गजल)

1222 1222 1222 1222

किसी मरते को जीने का वहाँ अधिकार हो जाए

अगर सहरा में पानी का ज़रा दीदार हो जाए



ये गिरना भी सबक कोई सँभलने के लिए होगा

मिलेगी कामयाबी हौंसला हर बार हो जाए



वफ़ा करके नहीं मिलती वफ़ा सबको यहाँ यारो

किसी की जीत उल्फत में,किसी की हार जाए



कि खुलकर आज कह डालो दबी है बात जो दिल में

*बुरा क्या है हकीकत का अगर इज़हार हो जाए*



खमोशी को हमेशा ही समझते हो क्यों कमजोरी?

यही गर्दिश में इंसाँ का बड़ा औज़ार हो… Continue

Added by सतविन्द्र कुमार राणा on May 22, 2017 at 9:00am — 17 Comments

एक हांडी दो पेट(लघुकथा)

एक हांडी दो पेट(लघुकथा)

हाई स्कूल के बाद, उसके आगे न पढ़ने के ऐलान करने पर माँ ने जोर देते हुए कहा,"बेटा!बिना पढ़ाई के आज कोई इज्जत नहीं है।तुझे यह कितनी बार समझाऊँ?"

पिता ने जोड़ा,"ठीक कह रही है तेरी माँ।"

वह झल्ला कर बोली,"माँ,बापू मेरे बस का नहीं है पढ़ना।ज्यादा धक्का ना करो।क्या कर लूँगी पढ़ के मैं?"

पिता बोले,"पढ़-लिख जावेगी तो अपने पैरों पर खड़ी हो सकेगी।किसी की तरफ देखना न पड़ेगा।जिंदगी में तेरे काम आवेगी पढ़ाई।"

"अच्छा!",उसने मुँह बनाया।

"बेटा!मैं ना पढ़… Continue

Added by सतविन्द्र कुमार राणा on May 14, 2017 at 8:00pm — 18 Comments

गीतिका/सतविन्द्र

(16 मात्राएँ)
कर्म करें तो बढ़ते सारे
बिना किये किस्मत भी हारे

रात चाँदनी और ये तारे
नहीं सुहाते बिना तुम्हारे

मजहब क्या दीवार है कोई
लिख डाले जो इतने नारे

रात अँधेरी से क्या डरना
हैं उम्मीदों के उजियारे

बीच भँवर में जीवन नैया
डोल रही,हैं दूर किनारे

खींचेगी फूलों की खुशबू
चलो देख कर काँटे प्यारे।

मौलिक एवं अप्रकाशित

Added by सतविन्द्र कुमार राणा on May 7, 2017 at 8:03am — 27 Comments

है गिला, तो गिला कीजिए(गजल)/सतविन्द्र

212 212 212
बात जो हो कहा कीजिए
दिल में ही क्यों रखा कीजिए?

चार दिन की है ये जिंदगी
बस ख़ुशी से रहा कीजिए

जो बुराई करे आपकी
आप उसका भला कीजिए।

रूठना बात अच्छी नहीं
है गिला, तो गिला कीजिए

मिल गये जब जरूरत हुई
बे ग़रज भी मिला कीजिए।

टूटता वो अकड़ता है जो
वक्त आए झुका कीजिए।

मौलिक एवं अप्रकाशित

Added by सतविन्द्र कुमार राणा on May 3, 2017 at 11:00pm — 18 Comments

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