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Harash Mahajan's Blog – April 2018 Archive (5)

उससे नज़रें मिलीं हादसा हो गया (तरही)

212 212 212 212

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उससे नज़रें मिलीं हादसा हो गया,

एक पल में यहाँ क्या से क्या हो गया ।

ख़त दिया था जो कासिद ने उसका मुझे,

"बिन अदालत लगे फ़ैसला हो गया" ।

दरमियाँ ही रहा दूर होकर भी गर,

जाने फिर क्यूँ वो मुझसे ख़फ़ा हो गया ।

गर निभाने की फ़ुर्सत नहीं थी उसे,

खुद ही कह देता वो बेवफ़ा हो गया।

दर्द सीने में ऱख राज़ उगला जो वो,

यूँ लगा मैं तो बे-आसरा हो गया…

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Added by Harash Mahajan on April 27, 2018 at 7:00pm — 13 Comments

ऐ ज़माने अब चला ऐसी हवा (गैर मुरद्दफ़)

गैर मुरद्दफ़ ग़ज़ल

2122 2122 212

*****†

ऐ ज़माने अब चला ऐसी हवा ,

लौट कर आये महब्बत में वफ़ा ।

दूरियाँ मिटती नहीं अब क्या करें,

कोई मिलने का निकालो रास्ता ।

चिलचिलाती धूप में आना सनम,

गुदगुदाती है तुम्हारी ये अदा ।

ज़ख्म दिल के देखकर रोते हैं हम,

याद आये इश्क़ का वो सिलसिला ।

तज्रिबा इतना है सूरत देख कर,

ये बता देते हैं कितना है नशा ।

वो लकीरों में था मेरे हाथ की,

मैं ज़माने में…

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Added by Harash Mahajan on April 14, 2018 at 11:00pm — 8 Comments

वो रंजिश में ताने दिए जा रहे हैं

122 122 122 122

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वो रंजिश में ताने दिए जा रहे हैं,

हैं अपने मगर मुझको तड़पा रहे हैं ।

.

सिफर हो चला हूँ मैं ख़्वाबों से खुद ही,

तभी गम के बादल बहुत छा रहे हैं ।

.

बसी दिल में उनकी वो तस्वीर ऐसी,

कि बनकर वो साये चले आ रहे हैं ।

.

सुना है कि मिलती दुआओं से मंज़िल,

नमाज़-ए-महब्बत पढ़े जा रहें हैं ।

.

मैं रोया हूँ इतना छुपा कर वो आँहें,

पुराने थे रिश्ते जो इतरा रहे हैं…

Continue

Added by Harash Mahajan on April 14, 2018 at 11:30am — 13 Comments

ज़ुदा हुआ पर सज़ा नहीं है

121 22 121 22

...

ज़ुदा हुआ पर सज़ा नहीं है,

न ये समझना ख़ुदा नहीं है ।

ज़रा सा नादाँ है इश्क़ में वो,

सबक़ वफ़ा का पढ़ा नहीं है'

दिखाऊँ कैसे वो दिल के अरमाँ ,

चराग दिल का जला नहीं है ।

है दर्द गम का सफर में अब तक,

कि अश्क़ अब तक गिरा नहीं है ।

न वो ही भूले ये दिल दुखाना,

यहाँ अना भी खुदा नहीं है ।

न देना मुझको ये ज़ह्र कोई,

हुनर तो है पर नया नहीं है ।

लिपट जा…

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Added by Harash Mahajan on April 8, 2018 at 9:30am — 16 Comments

बसती है मुहब्बतों की बस्तियाँ कभी-कभी

212 1212 1212 1212

...

बसती है मुहब्बतों की बस्तियाँ कभी-कभी,

रौंदती उन्हें ग़मों की तल्खियाँ कभी-कभी ।

ज़िन्दगी हूई जो बे-वफ़ा ये छोड़ा सोचकर,

डूबती समंदरों में कश्तियाँ कभी-कभी ।

गर सफर में हमसफ़र मिले तो फिर ये सोचना,

ज़िंदगी में लगती हैं ये अर्जियाँ कभी-कभी ।

उठ गए जो मुझको देख उम्र का लिहाज़ कर,

मुस्कराता देख अपनी झुर्रियाँ कभी-कभी ।

इश्क़ में यकीन होना लाजिमी तो है मगर,

दूर-दूर दिखती हैं…

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Added by Harash Mahajan on April 6, 2018 at 9:30pm — 19 Comments

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