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बन गया मैं यूँ खुदा सूली पे चढ़ जाने के बाद

2122 2122 2122 212

बन गया मैं यूँ खुदा, सूली पे चढ़ जाने के बाद,
पत्थरों में पूजे मुझको, अब सितम ढाने के बाद |

बनके पत्थर देखता हूँ,  इंतिहा बुत परस्ती की,
फूल बरसाए है दुनियां, चोट बरसाने के बाद |
 
मैं था पागल इश्क में, उसको न जाने क्या हुआ,
लौ बुझा दी इस दीये की, इतना समझाने के बाद |

बे-वफाई छेदती है, नर्म दिल की परतों को,
हूर रुख्सत हो कभी दिल में वो बस जाने के बाद |

इतना रोया हूँ, मगर अब, अश्क आँखों में नहीं,
पत्थरों के शहर में पत्थर हुआ आने के बाद |

***

"मौलिक व अप्रकाशित" © हर्ष महाजन

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Comment

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Comment by Harash Mahajan on August 4, 2015 at 5:40pm

आदरणीय मिथिलेश वामनकर जी पसंदगी के लिए दिल से शुक्रिया आपका | आपके आने से ग़ज़ल ग़ज़ल पूर्ण हुई सर ...शुक्रिया एक बार फिर ||

Comment by Harash Mahajan on August 4, 2015 at 5:36pm

आदरणीय गिरिराज भंडारी जी आपका हार्दिल आभार .....आपकी, दोष के प्रति, निशानदेही बिलकुल सही है सर, "नर्म" की जगह   नरम कह  गया हूँ | मेरा दिल से आभार है सर |
मक्ते का शेर बदल दिया था सर |

अब दोनों शेर यूँ हुए सर..
________________________

2122           2122          2122        212
बे-वफाई छेदती है, नरम दिल की परतों को,
हूर रुख़्सत हो कभी दिल में वो बस जाने के बाद |

००००

इतना रोया/ हूँ मगर अब /अश्क आँखों/ में नहीं,
पत्थरों के शहर में पत्थर हुआ आने के बाद
_______________________________

आपसे एक बार फिर अनुरोश है सर देखिएगा !!


साभार |


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on August 4, 2015 at 2:25pm

आदरणीय हर्ष जी, बढ़िया ग़ज़ल हुई है. दाद कुबूल फरमाए और गुनीजनों की इस्लाह पर गौर अवश्य फरमाएं 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on August 4, 2015 at 2:03pm

आदरणीय हर्ष भाई , बहुत अच्छी गज़ल कही है , हार्दिक बधाइयाँ आपको ।

ये दोनो शे र बे बहर हो गये हैं , देख ली जियेगा  --

बे-वफाई 2122 /  छेदती है 2122 ,/  नरम दिल की 1222  /  परतों को, 212
हूर रुक्सत हो कभी दिल में वो बस जाने के बाद |   रुख़्सत  या रुक्सत

इतना रोया 2122  /   हूँ ‘हर्ष’ अब  2212 / अश्क आँखों 2122 / में नहीं, 212
पत्थरों के शहर में पत्थर हुआ आने के बाद |

Comment by Harash Mahajan on August 4, 2015 at 1:22pm

आदरणीय Mohan Sethi 'इंतज़ार' जी आपको मेरी अदना सी कोशिश पसंद आई उसके लिए मैं तह-ए-दिल से शुक्र गुज़ार हूँ |उम्मीद करता हूँ आपका स्नेह यूँ ही बना रहेगा | आभार !!

Comment by Mohan Sethi 'इंतज़ार' on August 4, 2015 at 8:00am

कमाल ....वाह आदरणीय हर्ष जी 

बन गया मैं यूँ खुदा, सूली पे चढ़ जाने के बाद, 
पत्थरों में पूजे मुझको, अब सितम ढाने के बाद |

Comment by Harash Mahajan on August 3, 2015 at 9:24pm

आदरणीय krishna mishra 'jaan'gorakhpuri जी इस स्नेह के लिए बहुत बहुत शुक्रिया |हाँ आपने सही निशानदेही की है ..इस दोष को बताने के लिए एक बार पुन: धन्यवाद....
इसकी जगह अभी इस मिसरे को रखता हूँ ...
________________________

2122           2122          2122        212

इतना रोया/ हूँ मगर अब /अश्क आँखों/ में नहीं,
पत्थरों के शहर में पत्थर हुआ आने के बाद
_______________________________

साभार !!!

Comment by Krish mishra 'jaan' gorakhpuri on August 3, 2015 at 9:02pm

बनके पत्थर देखता हूँ,  इंतिहा बुत परस्ती की,
फूल बरसाए है दुनियां, चोट बरसाने के बाद |   

       

बेहतरीन गजल हुयी है आ० हर्षसरजी !तहेदिल से दाद प्रेषित हैं!

आ० शायद मक्ता में उला बेबहर लग रहा है!देख लीजिये !

2122 2122 2122 212

इतना रोया/ हूँ ‘हर्ष’ अब /अश्क आँखों/ में नहीं,
पत्थरों के शहर में पत्थर हुआ आने के बाद

Comment by Harash Mahajan on August 3, 2015 at 6:54pm

क्षमा चाहता हूँ बह्र लिखना भूल गया ...
____________________
2122 2122 2122 212
____________________

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