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अमि तेष's Blog – April 2011 Archive (5)

अभी अभी एक ख्याब चूर हुआ हैं......................

अभी अभी एक ख्याब चूर हुआ हैं
बो शक्स जो अज़ीज है, दूर हुआ हैं

मैं समझता हू वो मजबूर ही होगा
लोग कहतें हैं के उसें गुरूर हुआ हैं

अब भी उम्मीद हैं मुझें तेरे आनें की
महोब्बत का बुरा हश्र जरूर हुआ है

लुट के जिसनें कुछ नहीं पाया
प्यार में बो ही तो मशहूर हुआ हैं

तन्हा है 'अमि' फ़िर एक बार दुनियां में
दर्द तो इस बार भी भरपूर हुआ है
-अमि'अज़ीम'

Added by अमि तेष on April 29, 2011 at 9:49am — No Comments

जो पत्थर दिल थे आँसू बहानें लगें हैं.......

जो पत्थर दिल थे आँसू बहानें लगें हैं,

रु-ब-रु गर हो तो मुस्कुराने लगें हैं.

 

अज़ीब तर्ज है तकल्लुफ़ का फ़िज़ायों में,

छुपाते थे जो, सिलसिलें बतानें लगें हैं.

 

कल तलक मायूस थे जो ईद पर हम से,

अब मुखबरी मुहल्लें की सुनानें लगें हैं.…

Continue

Added by अमि तेष on April 21, 2011 at 1:30pm — 4 Comments

बैठा है, किसी नय़ी हलचल का इंतजार है

बैठा है, किसी नई हलचल का इंतजार है,

खुदगर्ज दिल को आज फ़िर किसी से प्यार है

पुरानी उलफ़तों की दुहाई अब नही देता,

खुमारी है नई, पर खौफ़ तो बरकरार है

हर ज़ख्म को वक्त ने कर दिया है बख्तरबंद,

कुछ दर्द के निशान आज भी यादगार है

परख लें कंही नकली न हो पैमानें का नशा

पोशीदा बातों का कोई और भी…

Continue

Added by अमि तेष on April 14, 2011 at 2:00pm — 4 Comments

उंगलियाँ सब पर उठातें रहें है हम............

उंगलियाँ सब पर उठातें रहें है हम,

आईनों से चेहरा छिपातें रहें है हम,



भ्रष्टाचार को हमनें जरुरत बना लिया,

मुल्क को अपनें ड़ुबातें रहें है हम,



रोंशनी से तिलमिलाती है आंखें हमारी,

बेईमानी से नज़रें मिलातें रहें है हम,



सियासत के बकरों का पेट नही भरता,

देश को चारे में खिलातें रहे है हम,



कितने ही बच्चें सोतें हैं यहाँ भूखें,

और सांपों को दुध पिलातें रहें हैं हम,



'अन्ना जी' का बहुत बहुत शुक्रियां,

वर्ना तो धोखा ही… Continue

Added by अमि तेष on April 8, 2011 at 2:00pm — 14 Comments

खुली आंखों से भी उसे सब ख्वाब लगता हैं

 





खुली आंखों से भी उसे सब ख्वाब लगता हैं

वो अंधेरें घर में बस एक चिराग लगता हैं



उसके वालिद भी एक कोरी किताब ही थे

वो भी अधूरी हसरतों का जवाव लगता हैं



जिसके माथे पर हर बक्त पसीना रहता हैं

वो खुद ही पाई पाई का हिसाब लगता हैं…

Continue

Added by अमि तेष on April 3, 2011 at 4:00pm — 2 Comments

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