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लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर''s Blog – March 2015 Archive (7)

प्यार होना भी जरूरी औ’ जरूरी दौलतें - लक्ष्मण धामी ’मुसाफिर’

2122    2122    2122        212

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जब धरा  पर रह  न पाये जो कभी औकात से

चाँद पर पहुँचो भले ही  क्या भला इस बात से

****

मुफ्तखोरी  की  ये  आदत  यार  चोरी से बुरी

चोर  भी समझा  रहा ये  बात  हमको रात से

****

बाँटने  में  हर  हुकूमत,  व्यस्त  है  खैरात ही

देश का, खुद का भला कब, हो सका खैरात से

*****

हो  न पाये कौवे शातिर, लाख कोशिश बाद भी

बाज  आयी  कोयलें  कब,  दोस्तों  औकात से

*****

प्यार   होना  भी  …

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Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on March 19, 2015 at 11:29am — 26 Comments

ये विष ही उगलते हैं - लक्ष्मण धामी ’मुसाफिर’

1222   1222   1222 1222

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सितारे  चाँद  सूरज  तो  समय से ही निकलते हैं

दियों  की  कमनसीबी  से   अँधेरे  रोज  छलते हैं

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किसी को देखकर गिरता  सँभल जाते समझ वाले

जिन्हें लत ठोकरों की हो  कहाँ  गिरकर सभलते हैं

****

खुशी  घर  में उन्हीं  से है  खुदा  की नेमतें वो तो

न डाँटा  कर  कभी उनको अगर बच्चे  मचलते हैं

****

कहा  है  सच   बुजुर्गों  ने  करें  सब  मनचली रूहें

किए बदनाम तन जाते कि कहकर ये…

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Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on March 14, 2015 at 11:10am — 23 Comments

बनाता खेत की रश्में - लक्ष्मण धामी ’मुसाफिर’

1222  1222 1222 1222

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बनाता  खेत  की  रश्में  चला  जो  हल नहीं सकता

लगाता  दौड़  की  शर्तें  यहाँ   जो  चल  नहीं सकता

***

पता  तो  है  सियासत  को  मगर  तकरीर करती है

कभी तकरीर  की  गर्मी  से  चूल्हा जल नही सकता

*****

भरोसा  आँख  वालों से  अधिक  अंधों को जो कहते

तुम्हें धोखा  हुआ  होगा कि सूरज  ढल नहीं  सकता

****

असर  कुछ  छोड़ जाएगी  मुहब्बत  की झमाझम ही

किसी के शुष्क  हृदय  को भिगा बादल   नहीं…

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Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on March 12, 2015 at 12:03pm — 26 Comments

प्रेत अफजल औ' कसाबों के यहाँ - लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर’

2122   2122   212

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फिर  चिरागों  को बुझाने ये लगे

रास्ता  तम  का  सजाने ये लगे

****

प्रेत अफजल औ' कसाबों के यहाँ

कुर्सियाँ  पाकर   जगाने  ये  लगे

****

साजिशें  रचते  मरे  हैं  जो उन्हें

देश भक्तों  में  गिनाने  ये  लगे

****

देश  के  गद्दार   जितने  बंद  हैं

राजनेता  कह  छुड़ाने  ये  लगे

****

बनके अपने आज खंजर देख लो

आस्तीनों   में   छुपाने   ये  लगे

****

हौसला  दहशतगरों  का यार यूँ…

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Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on March 11, 2015 at 10:30am — 16 Comments

था सरीफों के लिए वो - लक्ष्मण धामी ’मुसाफिर’

2122    2122   2122   212

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दुर्दिनों ने आँख का  जब यार  जाला  हर लिया

तब दिखा है मयकशी ने इक शिवाला हर लिया

****

बाँटती थी  कल  तलक तो  वो बहुत ही जोर दे

राह ने किस बात से  अब पाँव छाला हर लिया

****

था  सरीफों  के  लिए  वो  राह  से  भटकें नहीं

कोतवालो चोर  से  पहले  ही  ताला हर लिया

****

टोकता है  कौन  दिन  को  दे  उजाला  कुछ उसे

रात के हिस्से का जिसने सब उजाला हर लिया

****

था पुराना  ही  सही पर मान…

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Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on March 8, 2015 at 5:00am — 14 Comments

दिल से हम असआर पकाया करते हैं - लक्ष्मण धामी ’मुसाफिर’

2222    2112   2222

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पत्थर  पर  भी  प्यार  जताया करते हैं

इक  नूतन  संसार   बसाया   करते  हैं

****

लज्जत  तुमको  यार तनिक तो देंगे ही

दिल  से  हम असआर पकाया करते हैं

****

तनहा  हमको आप  समझना लोगो मत

हम  गम  का  दरवार  लगाया  करते  हैं

****

कुबड़ी  अपनी पीठ हुई  मत पूछो क्यों

यादों  का   हम  भार   उठाया  करते हैं

****

अश्कों से मत पूछ जिगर तक आजा तू

आँसू   केवल   सार   बताया   करते  हैं

****

जीवन…

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Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on March 7, 2015 at 11:03am — 13 Comments

भरत वो हो नहीं सकता - लक्ष्मण धामी ’मुसाफिर’

चुभन मत  याद  रखना  तुम मिली जो खार से यारो

रहे  बस  याद  फूलों  की  मिले   जो  प्यार  से  यारो

*****

नहीं शिव तो हुआ क्या फिर उपासक तो उसी के हम

गटक  लें  द्वेष  का  विष  अब चलो संसार से यारो

*****

न समझो  हक  तम्हें  तब तक  सुमारी दोस्तो में है

रखो गर  दुश्मनी  भी  तो  मिलो  अधिकार से यारो

*****

हमें जल  के  ही  मरना था जलाया नीर ने तन मन

खुशी  दो  पल   रही   केवल   बचे  अंगार  से  यारो

*****

भरत  वो  हो  नहीं  सकता  सदा …

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Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on March 2, 2015 at 11:00am — 11 Comments

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