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Manan Kumar singh's Blog – March 2016 Archive (5)

गीतिका(मनन)

राम-राम,सलाम संग होली का पैगाम:

#गीतिका#

30 मात्राएँ, 16 14 पर यति

मापनी 2*8 2*7

***

छौंरा-छौंरी खेले होली खिसिआये हैं काकाजी

अपने-काकी के लफड़े रिसिआये हैं काकाजी।

आयी है होली हुड़दंगी हैं रंगे रामू-रजनी

काकी रंगों से कतराती बिखिआये हैं काकाजी।

पकवानों से मन भरता कब मीठा-मीठा हो जाता

कुछ तीखी नमकीनी खातिर रिरिआये हैं काकाजी।

काकी कहती खुद को देखो देखा करते काकी को

मटका करती भर आँगन सज दिठिआये हैं काकाजी।

काकी कहती छोड़ो बूढ़े! अब तो… Continue

Added by Manan Kumar singh on March 24, 2016 at 8:11am — 2 Comments

गजल(मनन)

2212 2 22 22

गगरी कहो तो भरती कब है!

परवान चाहत चढती कब है।1



उफनी उमंगों की लहरी यह

चढती चली फिर गिरती कब है।2



कबसे रही भँवरों में फँसकर

नैया भला यह तिरती कब है।3



बाँहें पसारे सागर उछला

सिकता जरा भी घिरती कब है।4



उठते किले ख्वाहिश के कितने!

आशा अपूरित मरती कब है।5



टंगी नजर दर आहट खातिर

रुनझुन रूठी लय रचती कब है।6



धड़कन गिना दे पुरवा खुलके

महफिल कहीं भी सजती कब है ।7



भौंरा बिंधा है… Continue

Added by Manan Kumar singh on March 23, 2016 at 12:25pm — 5 Comments

गजल(व्यंग्य),मनन

2212 12 12
मछली बड़ी तो' जाल क्या?
निकली अगर मलाल क्या?
चारा बड़ा भला लगा
टोनाा गया बवाल क्या?
बंसी मगर रही कहूँ-
बेधार की,निहाल क्या?
पिटता रहा दफा दफा
पीटता अभी कपाल क्या?
घोंपे गये छुरे बहुत
बतला नमकहलाल क्या?
मौलिक व अप्रकाशित@मनन

Added by Manan Kumar singh on March 10, 2016 at 7:56pm — No Comments

गजल(मनन)

2122 2122 2122

आग से ही आग का संधान फिर फिर

हाथ जलता छल रहा इंसान फिर फिर।1



आग अपनी तो भली सबको लगी है

ढल रहा कितना सुलग दिनमान फिर फिर।2



आग सागर की उफनती किस कदर यह

और उठने को गला हिमवान फिर फिर।3



जब पवन ठिठका लता फिर है लजाई

आँसुओं में बह रहा तूफान फिर फिर।4



आग का मंजर गजल का वाकया है

बह्न सजती है जुड़े अरकान फिर फिर।5





जब मिली मंजिल मुसाफिर है थमा बस

फिर चला है हो रहा हलकान फिर फिर।6



गाँठ… Continue

Added by Manan Kumar singh on March 7, 2016 at 11:00am — 2 Comments

अभिमन्यु(अतुकांत कविता)

लड़ रहा वह युद्ध कबसे
पर थका कब?
घिर भी जाता अकेला
व्यूह में बेशस्त्र वह
हारता हिम्मत कहाँ?
लड़ता रहा बेखौफ वह
हाथ में पहिया भले टूटा हुआ
तो क्या हुआ?
हुंकारता दहला रहा वह
शूर वीरें को
जो बिके हर काल में
बेजुबां ही मर गये।
कैद मैं रहता कहाँ
फड़फड़ाता तोड़ता
भी वह कड़ी
रहता सदा ही मुक्त वह
जो कि परिंदा है।
लाख मारो मर नहीं सकता
'अभि' हर रोज जिंदा है।
मौलिक व अप्रकाशित@मनन

Added by Manan Kumar singh on March 3, 2016 at 1:30pm — 4 Comments

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