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Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan"'s Blog – March 2016 Archive (6)

जाने कितना प्रश्न करती

2122 2122 2122 2122

जाने कितना प्रश्न करती, और हरदम खिलखिलाती।

अपने मन में पीर जाने, कौन सी वो है छिपाती।।



जब मिली ज़िंदा हुआ हूँ, जब मिली मैं गुनगुनाया।

हर दफ़ा कागज़-कलम, की राह मुझको है दिखाती।।



उसके शब्दों से कोई कागज़ कभी भी जब सजाया।

खूब है हर बार ही वो तो ग़ज़ल बनकर रिझाती।



चूमती नज़रों से जब, मदहोश हो जाता हूँ मैं।

क्या कहूँ पगली वो लड़की, मुझको पागल है बनाती।।



कोई उसको बोल भी दो, ठीक ये बिल्कुल नहीं है।

प्यास सदियों की… Continue

Added by Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan" on March 30, 2016 at 6:38pm — 8 Comments

होली विशेष

बिखर रहे हैं व्योम में, तरह तरह के रंग।

सबके भीगे अंग हैं, मन में भरी उमंग।।



होली के इस पर्व की, अद्भुत है हुड़दंग।

कोई नाचे राह में, कोई बाँटें भंग।।



चूँ चूँ चूँ चूँ गा रही, गौरैया भी गीत।

मैं भी बैठा सुन रहा, क्या कहती ये मीत।।



डी जे वाला शोर ये, मुझको नहीं पसंद।

जाने कौन बजा रहा, भद्दे भद्दे छन्द।।



मैल मिटा कर मेल कर, मन का निखरे रंग।

वर्ग विभाजन बन्द कर, बदलो अपने ढंग।।



हम लोगों के मेल में, भारत का… Continue

Added by Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan" on March 23, 2016 at 10:48am — 4 Comments

ज़िंदा अभी तलक हैं, रावण दहेज़ वाले

2212 122 2212 122

दुःख सर पे चढ़ गया है, पीड़ा पिघल रही है।

हालात की तपिश से, नदिया निकल रही है।।

 

मरघट सा हो गया है, हर रास्ता शहर का।

इंसानियत चिता पर, हर ओर जल रही है।।

 

ज़िंदा अभी तलक हैं, रावण दहेज़ वाले।

अब भी दहेज़ वाली, क्यों सोच पल रही है।।

 

विद्रोह कर रही है, अब सोच भी हमारी।

क्यों मौन हूँ अभी तक, ये बात खल रही है।।

 

ग़र चे कलम के बदले, हथियार उठ गया तो।

पंकज से फिर न…

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Added by Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan" on March 21, 2016 at 11:30am — 6 Comments

मनस पृष्ठ मुझको पढ़ाती नहीं हो- ग़ज़ल

122 122 122 122



निगाहें भला क्यूँ मिलाते नहीं हो।

मनस पृष्ठ मुझको पढ़ाते नहीं हो।।



छिपाते हो तुम राज अपने जिया के।

बताओ मुझे क्यों बताते नहीं हो।।



हैं चेहरे पे क्यों ये उदासी की पर्तें।

भला नूर क्यूँ तुम दिखाते नहीं हो।।



सघन वेदना के जो घन हैं हृदय में।

भला फिर क्यूँ दरिया बहाते नहीं हो।।



मुझे तुमसे कोई शिकायत नहीं है।

सिवा इसके तुम मुस्कुराते नहीं हो।।



है 'पंकज'का नाता अगर नीर ही से।

तो नैनों में…

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Added by Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan" on March 14, 2016 at 12:00am — 17 Comments

शिवरात्रि विशेष

महाशिवरात्रि के पावन अवसर पर समस्त शिव भक्तों को सादर भेंट

.

जटाओं से निकल रही है, धार गंग नाथ शिव।

मुस्कुरा रहे गले में, धर भुजंग नाथ शिव।।

डमड्ड डमड्ड निनाद पर, हैं नृत्य कर रहे सभी।

मन लुभाये रूप आपका, मलंग नाथ शिव।।1।।



पाँव में कड़ा है और, त्रिशूल हाथ में धरे।

बाँध कर कमर में छाल, व्याह को चले हरे।।

चन्द्र ये ललाट पर, है विश्व दंग नाथ शिव।

मन लुभाये रूप आपका, मलंग नाथ शिव।।2।।



भंग की खुमार में हैं मस्त आज तो सभी।

सिर विहीन…

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Added by Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan" on March 6, 2016 at 9:30pm — 2 Comments

ग़ज़ल-पंकज मिश्र

2212 121 1222 212



इतना कमाल हुस्न, दिखाया ही किसलिये।

होनी नही थी बात, बुलाया ही किसलिये।।



मौका नहीं था देना, इबादत का ग़र हमें।

बुत से भला नक़ाब, हटाया ही किस लिये।।



सुननी नहीं थी तुमको, अगर मेरी आरज़ू।

फिर नाम का भजन ये, सिखाया ही किसलिये।।



हम भूल ही गये थे, कि लेनी है साँस भी।

जब मारना ही था तो, जिलाया ही किसलिये।।



अरमान सब थे दफ़्न, सुकूँ में बहुत थे हम।

बर्बाद गुल था करना, खिलाया ही किसलिये।।



मौलिक…

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Added by Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan" on March 5, 2016 at 12:00am — 9 Comments

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