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Manan Kumar singh's Blog – February 2016 Archive (5)

गजल(मनन)

2212 2212 22

कितना कहूँ सपना अधूरा है

मन तो महज अपना जमूरा है।1



लगता रहा तबसे हुआ मन का

होता कहाँ पर चाँद पूरा है?2



इक खूबसूरत-सी अदा ने तो

बनकर बला हर बार घूरा है।3



चाहा कभी नभ ने जमीं मिलती

छिटकी रही ठगता कँगूरा है।4



बस देखता चलता नदी में चुप

जो है छला शशि अक्श पूरा है।5



पिसती गयी है तिष्णगी रस की

निकला कहाँ यूँ आज बूरा है।6



कितनी मनौव्वल हो गयी अबतक

दिल तो रहा बदरंग भूरा है।7

मौलिक… Continue

Added by Manan Kumar singh on February 27, 2016 at 7:48pm — 2 Comments

गजल(मनन)

2212 2212 2

मेरी गजल कहती बहुत है

यह घाव भी करती बहुत है।1



मन का कहा करती अकड़कर

चुप भी कभी रहती बहुत है।2



घिरकर रदीफों से भले ही

यह काफिये रचती बहुत है।3



चलती पगों को यह सहेजे

बेजा भले बचती बहुत है।4



गम को बसा अपनी लहर में

बनकर नदी बहती बहुत है।5



कितने चलाते तीर शाइर

बिंधती मगर सजती बहुत है।6



आँसू छिपाकर के बहाती

हर रूक्न में रहती बहुत है।7



कितने उड़ा लेती सपन यह

अशआर भी कहती… Continue

Added by Manan Kumar singh on February 23, 2016 at 6:55am — 4 Comments

गजल(मनन)

2122 2122 212

बादलों ने दे लिया धरना जरा

रोशनी होगी अभी रूकना जरा।1

चीड़ती लाली घटा को देख तो

है खड़ा कबसेअभी झुकना जरा।2

बात नजरों से मुकममिल हो रही

बंद ही मुख आज बस रखना जरा।3

होंठ देते हैं गवाही मौन की

आँकने का सुख अभी चखना जरा।4

है वजह कुछ बात बनने की अभी

बोलती बुत है कभी कहना जरा।5

वह शिखर से है उतरती भी कभी

बस कहूँ अपनी जगह उठना जरा।6

छिप गयी जो रोशनी तो क्या हुआ

फिर हँसेगी मत अभी रूठना जरा।7

भर रहा रस है कली में बस… Continue

Added by Manan Kumar singh on February 19, 2016 at 12:00pm — 8 Comments

गजल(मनन)

2122 2122 2122 2

भौंकते कुत्ते ठिकाना चाहिए अपना

टोकते हर शख्स आना चाहिए अपना।1



राह इतनी है नहीं आसां कि चाहे वह

घुस चले घर में बताना चाहिए अपना।2



देख कुत्ते भी नहीं गाते कभी ऐसे

जय कहें घर की फसाना चाहिये अपना।3



पल गये हो पौध तुम रस पी रहे घर का

शाख भटकी क्यूँ बचाना चाहिये अपना।4



साख कुत्तों ने बचायी है अभी तक भी

ताव दुश्मन को दिखाना चाहिये अपना।5



है नहीं पहचान करने क्या चले हो तुम

जल रहे हैं घर बुझाना… Continue

Added by Manan Kumar singh on February 15, 2016 at 10:08am — 2 Comments

गजल

2122 2122 212

काँपती घाटी बुलाती है किसे
वादियाँ चुप अब उठाती हैं किसे?1

उलफतें अब हो रहीं बेजार हैं
मुफ्त की माशूका'भाती है किसे?2

हो गयी कुर्सी सियासत की कला
देखिये फिर से लुभाती है किसे?3

शोर कितने कर रहे बेघर सभी
सोचते हैं फिर बसाती है किसे?4

हो भले अपना निशाँ अब एकला
चंचला इसको थमाती है किसे?5
मौलिक व अप्रकाशित@मनन

Added by Manan Kumar singh on February 10, 2016 at 9:00pm — 6 Comments

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