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Samar kabeer's Blog – February 2015 Archive (6)

ग़ज़ल-फागुन की मस्ती में

बड़ा चंचल हुवा जाता है मन फागुन की मस्ती में

नज़र आता है जब भीगा बदन फागुन की मस्ती में



लगी है दिल में ये कैसी अगन फागुन की मस्ती में

मज़ा देती है शोलों की तपन फागुन की मस्ती में



चली है झूमती गाती पवन फागुन की मस्ती में

खिला जाता है ये दिल का चमन फागुन की मस्ती में



सखी मन का मयूरा है मगन फागुन की मस्ती में

पिया से जा लगे मोरे नयन फागुन की मस्ती में



ये सोचा है कि इज़हार-ए-मुहब्बत कर ही डालूंगा

अगर हो जाएगा उन से मिलन फागुन की… Continue

Added by Samar kabeer on February 28, 2015 at 10:03pm — 12 Comments

ग़ज़ल-झील सा शीतल चाँद से सुन्दर लिख्खा है |

झील सा शीतल चाँद से सुन्दर लिख्खा है

हमने जो देखा है मंज़र लिख्खा है



अबजद हव्वज़ का भी जिन को इल्म नहीं

दुनिया ने उन को भी सुख़नवर लिख्खा है



आज उसी पर फूल वफ़ा के खिलते हैं

तुमने जिस धरती को बंजर लिख्खा है



पढ़कर देखो मेरी इन तहरीरों को

तुमको ही उन्वान बनाकर लिख्खा है



कुछ लोगों ने दौर-ए-ख़िज़ाँ के बारे में

कमरे में फूलों को सजाकर लिख्खा है



हमने बग़ावत करके सारी दुनिया से

महरूमी का नाम सिकन्दर लिख्खा है



"समर… Continue

Added by Samar kabeer on February 20, 2015 at 11:14pm — 42 Comments

ग़ज़ल

आशिक़ों की आँखो का रुख़ बदलने लगता है

जब किसी जवानी का चाँद ढलने लगता है



इब्तिदा ख़ुशामद से इल्तिजा से होती है

और फिर ये होता है,नाम चलने लगता है



सब्र की नसीहत भी काम कुछ नहीं करती

जब किसी की चाहत में दिल मचलने लगता है



हमने दिल को ले जाकर उस जगह पे रख्खा है

जिस जगह पे ख़्वाहिश का दम निकलने लगता है



जब भी मैं अंधेरों से हमकलाम होता हूँ

इक चराग़ सा मेरे दिल में जलने लगता है



आख़िरत के बारे में जब भी सोचता हूँ मैं

रूह… Continue

Added by Samar kabeer on February 15, 2015 at 10:30pm — 16 Comments

ग़ज़ल

इक ग़रीब औरत की बेबसी का क़िस्सा है

सादगी समझते हो, सादगी का क़िस्सा है



मैं सुना रहा हूँ और आप मुस्कुराते हैं

थोड़ा सोचकर देखें आप ही का क़िस्सा है



एक था सख़ी हातिम ये वही रिवायत है

मेरे मोहतरम महमाँ ये उसी का क़िस्सा है



एटमी धमाकों का इन पे क्या असर होगा

अब भी इनके मकतब में जलपरी का क़िस्सा है



बुलबुलों के होटों पर गुलशनों की बातें हैं

आदमी के होटों पर आदमी का क़िस्सा है



रोज़ ही वो सुनते थे, पूछ ही लिया इक दिन

किस हसीं… Continue

Added by Samar kabeer on February 10, 2015 at 10:42pm — 11 Comments

ग़ज़ल

समझ कर भी ये कुछ समझा नहीं है

ख़ुदा से आदमी डरता नहीं है



हमें हक़ के लिये लड़ना पड़ेगा

ये मौक़ा हाथ मलने का नहीं है



शराफ़त की दुहाई देने वालों

मुक़ाबिल इतना शाइस्ता नहीं है



ये आवाज़ों का जंगल है यहाँ पर

कोई फ़न्कार की सुनता नहीं है



नज़र के सामने रहता है लेकिन

कभी हमने उसे देखा नहीं है



ये दुनिया है संभल कर पाँव रखना

तुम्हारे घर का बाग़ीचा नहीं है



मैं अपनी क़ब्र में लेटा हुवा हूँ

मुझे अब कोई अन्देशा नहीं… Continue

Added by Samar kabeer on February 7, 2015 at 3:30pm — 23 Comments

ग़ज़ल

सारी दुनिया को तमाज़त से बचा लेते हैं
हम वह बादल हैं जो सूरज को छुपा लेते हैं

मेरे ख़ुश होने से कब उन को खुशी होती है
मेरे एहबाब मिरे ग़म का मज़ा लेते हैं

शैर कहने का हुनर सबको कहाँ मिलता हैं
यूँ तो क़व्वाल भी अशआर बना लेते हैं

कितना मासूम है देखो ज़रा फूलों का मिज़ाज
तिशनगी औस के क़तरों से बुझा लते हैं

मुद्दतों हम को सताता रहा तहज़ीब का ग़म
आज इतना है कि आँखों को झुका लेते हैं

------ समर कबीर

मौलिक / अप्रकशित

Added by Samar kabeer on February 2, 2015 at 4:04pm — 17 Comments

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