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Sheikh Shahzad Usmani's Blog – January 2017 Archive (6)

जन-मन भावना (लघुकथा) /शेख़ शहज़ाद उस्मानी

"अरे, हामिद, हेमंत, हरिया और हरवीर .. तुम सब ये तिरंगे लेकर यूँ कहाँ जा रहे हो यहाँ से?" खेत की मेड़ पर दौड़ रहे बच्चों से रामदीन ने चिल्लाकर पूछा।



बच्चे दौड़ते हुए ही क्रमशः बोले-



"नेताजी का स्वागत करने!"

"सुना है वे बच्चों की सुनते हैं!"

"आज हम अपने मन की बातें कह कर रहेंगे उनसे!"



यह सुनकर मुस्कराते हुए रामदीन ने कहा- "लेकिन सड़क से जाओ न! मंच के पास पहुंचो!"



"चाचा, वहां पुलिस लगी है ,भगा देंगे हमें!" हामिद ने तिरंगा संभालते हुए… Continue

Added by Sheikh Shahzad Usmani on January 28, 2017 at 9:22pm — 2 Comments

अच्छे और बुरे पर्दे (लघुकथा) / शेख़ शहज़ाद उस्मानी

स्मार्ट कक्षा में पटल पर अब तीन कानों का सांकेतिक चित्र प्रदर्शित किया गया जिसमें एक खुले हुए कान के दोनों तरफ के कान उँगलियों से ढके हुए थे। अब्राहम लिंकन के 'उनके ही बेटे के हेडमास्टर के नाम पत्र' के अगले पैराग्राफ का हिन्दी अनुवाद समझाते हुए शिक्षक ने छात्रों से कहा- "हेडमास्टर जी, मेरे बेटे को यह भी सिखाइयेगा कि सुने सबकी और जो कुछ भी वह सुने, उसे सत्य की छलनी से छान कर जो अच्छी बात निकले, केवल उसे ही ग्रहण करे!" इतना कहकर शिक्षक ने पटल के चित्र के खुले वाले कान के अंदर की तरफ उँगली से… Continue

Added by Sheikh Shahzad Usmani on January 26, 2017 at 9:30pm — 3 Comments

किसका हक़ ? (लघुकथा) /शेख़ शहज़ाद उस्मानी

"नहीं, अनवर मियाँ, यह तो नहीं होने दूंगी!" जुबेदा ने पोटली अपनी ओर खींचते हुए कहा- "मेरे अब्बू के ख़ून- पसीने की कमाई का ज़ेवर है यह और मेरी जमा पूँजी!"



"लेकिन मुझे मिले दहेज़ पर मेरा हक़ है! मैं जो चाहूं, करूँगा!" अनवर ने उसको आँखें दिखाते हुए पोटली फिर अपनी तरफ़ खींच ली।



"है, तुम्हारा हक़ है, और मेरा भी! लेकिन मेरी मर्ज़ी के बग़ैर तुम इसे अपनी अम्मीजान के इलाज़ में हरग़िज़ नहीं लगा सकते!"



"तो क्या तुम उन्हें अपनी अम्मी की तरह नहीं मानतीं!"



"मानती… Continue

Added by Sheikh Shahzad Usmani on January 21, 2017 at 5:00pm — 9 Comments

डिजिटल स्ट्रेन्थ़ (लघुकथा) /शेख़ शहज़ाद उस्मानी

पार्क में योग करने के पश्चात जोशी जी मेहता बाबू के बगल में बैठते हुए बोले- "भैया, इस क़ुदरती माहौल में योग करके तो धन्य हो गया! बीमारियों से मुक्ति पा कर ख़ुद को जवां सा महसूस करता हूँ!"



"हाँ जोशी जी, सुबह-शाम यहाँ आ कर मैं भी एक अद्भुत शक्ति हासिल कर तनाव मुक्त हो जाता हूँ!"



फिर पास ही बैठे ,स्मार्ट फ़ोनों पर आँखें गढ़ाये दो युवकों की तरफ़ देख कर वे बोले- "तरस तो इन पर आता है कि इन पर अद्भुत बुढ़ापा आ रहा है!"



"बुढ़ापा!"



"हाँ बुढ़ापा ! कम उम्र में… Continue

Added by Sheikh Shahzad Usmani on January 20, 2017 at 7:32pm — 8 Comments

यथार्थ या सत्यार्थ (लघुकथा) / शेख़ शहज़ाद उस्मानी

" अच्छा लगता है कि तुम मेरी ज़िन्दगी के इस मुकाम पर भी हमेशा की तरह अपनों की तरह समझाईश देती हो! " उसने सिगरेट का धुआँ मुंह से छोड़ते हुए अपनी इकलौती ख़ास सहेली से कहा।



"समझाईश! कभी असर हुआ मेरी समझाईश का तुम पर? अरे, माँ-बाप के अरमानों का नहीं,तो अपने असली वजूद का अब तो कुछ ख़्याल करो!"



सहेली की बात पर मुस्कराते हुए उसने कहा- "तूने कौन से तीर मार लिए? मैंने तो ऐसी कई सच्चाइयों को नज़दीक़ से जान लिया है, जो तुम्हारी जैसी कई बयान तक नहीं कर पातीं! खुश हूँ मैं अपनी इस… Continue

Added by Sheikh Shahzad Usmani on January 14, 2017 at 4:31pm — 8 Comments

काग-भगोड़े और इंद्रधनुष (लघुकथा) / शेख़ शहज़ाद उस्मानी

हर बार की तरह इस बार भी अपनी चित्रकला कृति को यूसुफ भाई अपने दोस्तों को दिखाकर व्यंग्य मिश्रित तारीफ़ें सुन रहे थे। कलाकृति में श्वेत-श्याम रंगों में खेत, बादल और एक किशोरी थी जो खड़े होकर रंगीन इंद्रधनुष बनाकर बादलों में छिपे पीले सूरज के गोलार्ध में किरणें बना रही थी। बस यही चर्चा के विषय थे।



मदन ने ठहाका लगाते हुए कहा- "लो खड़ी हो गई फिर नई फसल सतरंगे सपने सँजोए!"



"सतरंगे सपने! इंद्रधनुष भी सूरज की किरणों और पानी की बूंदों पर निर्भर होता है भाई!" लाखन ने… Continue

Added by Sheikh Shahzad Usmani on January 7, 2017 at 2:15am — 8 Comments

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