तारों भरी रात, फैल रही चाँदनी
इठलाता पवन, मतवाला पवन
तरू तरु के पात-पात पर
उमढ़-उमढ़ रहा उल्लास
मेरा मन क्यूँ उन्मन
क्यूँ इतना उदास
खुशी ... पिघलती हुई मोम-सी
जाने क्यूँ उसे हमेशा
होती है जाने की जल्दी
आती है, चली जाती है
आ..ती है
आलोप हो जाती है
कोई टुकड़ा स्याह बादल का आकर
रुक गया है मेरी छत पर मानो
कैसा सिलसिला है प्रकृति का यह
दर्द की अवधि समाप्त नहीं…
ContinueAdded by vijay nikore on January 5, 2026 at 9:00am — 1 Comment
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