कोरा कागज़
अगर तू चाहती तो कभी भी
कोरे कागज़ पर मुझको
अँगूठा लगाने को कह सकती थी
और जानती हो, मैं..
मैं ‘न’ न कहता ।
उस कोरे कागज़ पर फिर
तुम कुछ भी लिख सकती थी।
तुमने मेरे नाम पर मुझसे
अधिकार माँगा
मैंने वह आँखें मूँद के दे दिया,
पर जब "तुम्हारे" अपने नाम पर तुमने
मुझसे अधिकार माँगा,
मेरे ओंठों पर हर पल नाम तुम्हारा था,
अत: यह अधिकार मैं तुम्हें दे न सका ।
मेरे धुँधँले-धुँधले सुलगते वजूद ने
नीदों…
Added by vijay nikore on January 29, 2013 at 3:00pm — 17 Comments
संस्मरण ... अमृता प्रीतम जी
यह संस्मरण एक उस लेखक पर है जिसने केवल अपनी ही ज़िन्दगी नहीं जी, अपितु उस प्रत्येक मानव की ज़िन्दगी जी है जिसने ज़िदगी और मौत को,खुशी और ग़म को, एक ही प्याले में घोल कर पिया है ... जिसके लिए ज़िन्दगी की "खामोशी की बर्फ़ कहीं से भी टूटती पिघलती नहीं थी।"
यह संस्मरण उस महान कवयित्रि पर है जो सारी उम्र कल्पना के गीत लिखती रही...."पर मैं वह नहीं हूँ जिसे कोई आवाज़ दे, और मैं यह भी जानती हूँ, मेरी…
ContinueAdded by vijay nikore on January 29, 2013 at 1:00pm — 17 Comments
आवाहन
झूमते पत्तों में से छन कर आई मेरे आँगन में
हँसती-हँसती उदभासित किरणों की छाप,
नभ-स्पर्शी हवाएँ तरंगित…
ContinueAdded by vijay nikore on January 19, 2013 at 7:15pm — 15 Comments
कट गई है लहर
जाने क्यूँ कुछ ऐसा-ऐसा लगता है
कि जैसे कट गई लहर नदी से,
वापस न लौट सकी है,
और ज़िन्दगी इस कटी लहर में धीरे-धीरे
तनहा तिनके की तरह …
ContinueAdded by vijay nikore on January 9, 2013 at 6:00pm — 7 Comments
भोर के पंछी
तुम ...
रहस्यमय भोर के निर्दोष पंछी
तुमसे उदित होता था मेरा आकाश,
सपने तुम्हारे चले आते थे निसंकोच,
खोल देते थे पल में मेरे मन के कपाट
और मैं ...
मैं तुम्हें सोचते-सोचते, बच्चों-सी,
नींदों में मुस्करा देती थी,
तुम्हें पा लेती थी।
पर सुनो!
सुन सकते हो क्या ... ?
मैं अब
तुम्हें पा नहीं सकती थी,
एक ही रास्ता…
Added by vijay nikore on January 2, 2013 at 2:30pm — 28 Comments
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