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March 2014 Blog Posts

कह मुकरियाँ 26 से 35 (कल्पना रामानी)

26)

अपने मन का भेद छिपाए।

मेरे मन में सेंध लगाए।

रखता मुझ पर नज़र निरंतर।

क्या सखी साजन?

ना सखि, ईश्वर!

27)

हरजाई दिल तोड़ गया है।

मुझे बे खता छोड़ गया है।

नहीं भूल पाता उसको मन।

क्या सखि साजन?

ना सखि बचपन!

28)

जब से उससे प्रीत लगाई।

थामे रहता सदा कलाई।

क्षण भर ढीला करे न बंधन।

क्या सखि साजन?

ना सखि, कंगन!

29)

जब भी देना चाहूँ प्यार।

बेदर्दी कर देता…

Continue

Added by कल्पना रामानी on March 1, 2014 at 11:30am — 22 Comments

पुष्प की पीड़ा

एक मासूम कली

भंवरे के स्पर्श से

खिल उठी

मुस्काई

हर्षाई

लिया पुष्प सा रूप

एक दिन

भंवरा उसका खो गया

पुष्प का हाल बुरा हो गया

उदास बेचैन पुष्प को चाहिए था

थोड़ा प्यार

थोड़ा दुलार

थोड़ी हंसी

थोड़ी हमदर्दी

जो ना मिल पाई



फिर एक दिन

आया एक भंवरा

जो उसके आसपास मंडराता

उसे तराने सुनाता

उसे खिलखिलाना सिखाता

पुष्प हुआ पुनर्जीवित

उसके प्यार से

दुलार से

पर

चिंतित…

Continue

Added by Sarita Bhatia on March 1, 2014 at 9:30am — 16 Comments

ग़ज़ल- जिंदगी कितनी हंसीं है आओ आकर देख लो

जिंदगी कितनी हंसीं है आओ आकर देख लो

एक पिंजराबंद पंछी को उड़ाकर देख लो



तुम हमें समझा रहे हो बेवफाई का सबब?

फैसला हो जायेगा नज़रें मिलाकर देख लो



मंजिलें जब पास हों तब और करती हैं भ्रमित

जो न हो विश्वास क़दमों को बढ़ा कर देख लो



हम निहत्थे हैं मगर माँ की दुवाएँ साथ हैं

जीत किसकी, हार किसकी आज़मा कर देख लो



माँ मुझे मालूम है हालात कुछ अच्छे नहीं

हौसला हो जायेगा गर मुस्कुरा कर देख लो



लोग मुझसे पूछते हैं शायरी कैसे… Continue

Added by Anurag Anubhav on March 1, 2014 at 12:20am — 19 Comments

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