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अजीत शर्मा 'आकाश'
  • Allahabad, U.P.
  • India
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अजीत शर्मा 'आकाश' replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-100 (भाग -2)
"अच्छी ग़ज़ल हुई है आ0 रवि जी... ख़ुशबू का प्रयोग एकवचन में ही किया जाना चाहिए.... बहुवचन में इसका प्रयोग अशुद्ध प्रतीत होता है !!!"
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"बहुत उम्दा कहा है आ0 राजेश कुमारी जी.... वाह !!!"
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"अत्यन्त आभार आ0 रवि शुक्ल जी !!!"
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"बहुत-बहुत आभार आ0 राणा प्रताप सिंह जी !!!"
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"आभार, और अच्छे सुझाव के लिए बहुत धन्यवाद आ0 अफ़रोज़ साहब !!!"
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"बहुत आभारी हूँ आ0 महेन्द्र कुमार जी !!!"
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"आपका आशीष शिरोधार्य, आदरणीय !!!"
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"बहुत शुक्रिया नादिर भाई.... अपहृत 22 होगा.... [अपहत] के वज़न पर उच्चारण होगा>> AP+HRIT"
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"बहुत शुक्रिया नादिर भाई.... अपहृत 22 होगा.... APHRIT !!!"
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"बिल्कुल सही कहा आपने आ0 योगराज जी.... मैं भी यही सोच रहा था, लेकिन फिर लगा कि विशुद्ध संस्कृत का यह शब्द कहीं अजीब सा न लगे.... लेकिन, आपने मेरे मन की बात कह दी.... आभारी हूँ !!!"
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"बहुत-बहुत आभार भाई नीलेश जी"
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"कामयाब है तीसरी गज़ल भी, नीलेश भाई.... बधाई !!!"
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"अहा.... क्या कहने हैं.... तीनों ग़ज़लों में तीन तरह की गिरहें, वो भी लाजवाब..... और आपके अन्य अशआर का तो कहना ही क्या.... सबको सीखने को मिलता है आपसे आ0 समर साहब !!!"
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Profile Information

Gender
Male
City State
Allahabad U.P.
Native Place
Etawah
Profession
Service
About me
Kavi-Shair

अजीत शर्मा 'आकाश''s Blog

ग़ज़ल - देख लेना क्रान्ति अपनी रंग लायेगी ज़रूर

ग़ज़ल

 

देख लेना क्रान्ति अपनी रंग लायेगी ज़रूर

ये महा हड़ताल शासन को झुकायेगी ज़रूर

 

देखकर गहरा अंधेरा किसलिए मायूस हो

रात कितनी भी हो लम्बी भोर आयेगी ज़रूर

 

हौसला हालात से लड़ने का होना चाहिए

आयेंगे तूफ़ां तो कश्ती डगमगायेगी ज़रूर

 

अब बग़ावत पर उतर आओ सुनो पूरी तरह

वर्ना ये सत्ता तुम्हें  भी नोंच खायेगी ज़रूर

 

ये हमारी सारी माँगें मान तो ली जायेंगी

हाँ मगर सरकार हमको…

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Posted on November 21, 2013 at 6:30am — 11 Comments

जुम्मन ख़ाँ (व्यंग्य -रचना)

__________________

जुम्मन ख़ाँ

__________________

अब तो थोड़ा सोचो और विचारो जुम्मन ख़ाँ

मेरी मानो अपना हाल सुधारो जुम्मन ख़ाँ .

 

सच्चाई को कब तक ओढ़ो और बिछाओगे

ख़ुदग़र्ज़ी से, मक्कारी से आँख चुराओगे

मुँह में रखकर राम बगल में छुरी नहीं रखते

नीयत कभी किसी की ख़ातिर बुरी नहीं रखते

निश्छल चेहरे पर छाया जो ये भोलापन है

सच मानो जुम्मन ख़ाँ सबसे शातिर दुश्मन है

थोड़ा सा तो डूबो धन-दौलत की चाहत में…

Continue

Posted on October 13, 2013 at 2:30pm — 12 Comments

ग़ज़ल

---------------------------

           ग़ज़ल

---------------------------

कैसा      भाईचारा     जी

रख दो  माल  हमारा  जी .

 

दिल का क्या कहना मानें

दिल  तो  है  आवारा  जी  .

 

शीशा तोड़ा,  क्या तोड़ा ?

तोड़ो  तम की  कारा  जी .

 

माल  अकेले  गपक गये 

तुम  सारे  का  सारा  जी .

 

जाओ,  कूद पड़ो  रण में

दुश्मन ने  ललकारा  जी .

 

पेट भरेगा…

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Posted on October 1, 2013 at 8:00am — 14 Comments

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At 6:14pm on October 18, 2013, वीनस केसरी said…

WAAH PHOTO LAG GAI :)))))))))

At 11:37pm on August 11, 2013, mrs manjari pandey said…

     धन्यवाद आदरणीय अजीत जी !

At 11:33am on July 11, 2013, वीनस केसरी said…

स्वागत स्वागत हार्दिक स्वागत

At 11:19am on July 11, 2013,
सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey
said…

आदरणीय अजीत ’आकाश’ भाईजी, आपका इस मंच पर हार्दिक स्वागत है. पूर्ण विश्वास है, इस मंच के साहित्याग्रही आपकी सुखकर रचनाओं का रसास्वादन करेंगे. 

शुभ-शुभ

 
 
 

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