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मध्यप्रदेश के नर्मदांचल क्षेत्र, जो की पूर्वी निमाड़ व  मालवा से लगा हुआ है, में नवरात्रि के पश्चात्, विजयादशमी से लेकर शरद-पूर्णिमा तक एक उत्सव चलता है, जिसे " टेसू-उत्सव"  कहते हैं. इस उत्सव में छोटे खास तौर पर १० से १५ वर्ष तक की उम्र के लड़कों की खास भूमिका होती है.

हालाँकि आज की आधुनिकता ने जिस प्रकार से, पूरे भारतवर्ष की पुरानी प्रथाओं व् परम्पराओं पर गहरा असर डाला है, वैसे ही यह उत्सव भी अब कम ही देखने को मिलता है. आजकल के किशोरों और युवाओं के पास, समयाभाव भी है और वे फुर्सत के क्षणों में अन्य किन्हीं साधनों में व्यस्त रहना अधिक पसंद करते हैं. फिर भी यह उत्सव आज भी जीवित है और कुछ उत्साही युवक और किशोर इसमें प्रतिभाग करते हैं.

मैंने अपने बचपन में इस उत्सव को अपने मित्रों के साथ मनाया है. इस उत्सव में एक गीत भी गाते थे, जो आज,  उन्ही दिनों को सोचते हुए, याद आ गया.

विजयादशमी के दिन हम एक लकड़ी का पुतला बनाते थे. उसका चेहरा थोड़ा डरावना रखते थे. उसे पुराने कपडे पहनाकर, उसके मुंह में बीड़ी फसाकर, सर पर जलता हुआ  दीपक रख देते थे. विजयादशमी से शरद-पूर्णिमा तक, छ: दिनों तक, शाम के समय मोहल्ले में घर-घर जाकर, उसे सामने खड़ा करके, गीत गाते थे और हर घर से, गेहूं, चावल, अरहर की दाल, शुद्ध घी या कुछ नगद पैसे, जिसको जो देते बने, ले आते थे, कुछ लोग तो कुछ भी नही देते थे, और भगा देते थे..

शरद-पूर्णिमा की शाम को अंतिम दिन, सभी घर जाकर, तत्पश्चात उस पुतले याने टेसू.. को, लाठियों से पीटकर, तोड़ देते थे, तथा आग लगाकर, जला देते थे..

फिर छ: दिनों का इकट्ठा किया हुआ, सामान व पैसों से, सारे सदस्य दाल-बाटी, चूरमा बनाकर, खा लिया करते थे..

हर घर से भिक्षा मांगते हुए हम एक गीत गाते थे जिसकी पंक्तिया कुछ निम्न प्रकार से है..

   टेसू आया टेस से

  पैसे निकालो, जेब से

 मेरा टेसू यहीं खड़ा

खाने को मंगता,दही-बड़ा

दही-बड़े से ऊँचीं बात

कितने लोग तुमारे साथ

तीन सौ अस्सी,नोसौ सात

छल्ला बोली को छालो रे...

छल्ला-छल्ला बाकड़ा रे, तीकड़ा रे..

हनमान जी की गादी-ऐ,मरोडियो रे लाल पानी जाए

बीबी का तेरी कइयो रे, मियां गोते खाए

टेकरी पे टेकरी, मियां ने तोड़ी सांस

मियां की जल गई दड्डी तो, बीबी तोड़े दांत

घंटा-घर पे चार घडी

चारों में जंजीर पड़ी

जब जब घंटा बजता है

खड़ा मुसाफिर हँसता है

हँसते हँसते भाग गया

जोरू को लेके भाग गया

टेसू अच्छा होता तो, उसकी बहु लाते

बहु अच्छी होती तो , ऊँट पे बिठाते

ऊँट अच्छा होता तो , रेत पे चलाते

रेत अच्छी होती तो, गंगा बहाते

गंगा में डूब डूब न्हाते, मौज उड़ाते..

इस पूरे गीत को सभी लड़के, समूह में एक साथ गाते थे, जिस घर के लोग कंजूस या कुछ नही देते थे, वहां इसे छोटा कर दिया करते थे..

आज वो उत्साह और उल्लास के दिन बहुत याद आते हैं.

जितेन्द्र ' गीत '

(मौलिकव अप्रकाशित)

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Replies to This Discussion

यह तो नई पीढ़ी के आपसी सामन्जस्य ,मेल-जोल और समाज के हर घर से जुड़े रहने ,हर घर के सदस्यों के स्वभाव को जानते-समझते बड़े होने की सुंदर लौकिक परम्परा लगती है जिसमें समाजिक समरसता का पाठ बीज रूप में अंतरगर्भित है जो समय के साथ स्वेम ही विकसता होगा . बहुत सुंदर ध्येय अंतरनिहित है . शुभ विजय गीतजी .

सर्वप्रथम आपका दिली आभार, आदरणीय विजय मिश्र जी, आपने अपना अमूल्य समय देकर, मेरे प्रथम प्रयास पर, अपनी सकारात्मक प्रतिक्रिया से, मेरी लेखनी को बेहद मनोबल दिया, आशीर्वाद व् स्नेह यूँही बनाये रखियेगा..

नई पीढ़ियों की बात करें तो, आजकल कोई किसी से जुड़ना नही चाहता, हर नौजवान अति संवेदनशील होता जा रहा है, अपना खाली

वक़्त समाज,रिश्तों या परम्पराओं को निभाने की बजाय, अन्य साधनों में उलझा रहता है, अकेले ही बैठकर घंटो गुजार देता है, और जब वास्तविक समस्याएं सामने आकर खड़ी हो जाती है, तो निर्णय लेने की जगह, दूर भागने लगता है,

आदरणीय विजय जी बहुत सुदर होते थे पुराने पारम्परिक उत्सव !! उन्ही मे से एक का वर्णन आपने किया है !!! मुझे डर है कि टी व्ही  युग इन सब को खा न जाये , दुखद है कि आजकल के बच्चे ऐसे पारमपरिक उत्सवों के लिये समय नही निकाल पाते या नही निकालना चाहते !!! टेसू उत्सव के बारे मे जान कर अच्छा लगा , यह हमारे छत्तीस गढ के छेर छेरा उत्सव जैसी ही है !! इसमे भी ऐसे ही घर घर मांगने जाते है औत गीत गाते है !!!

पुरानी यादें ताज़ा करने के लिये आपका आभार !!!

आपकी उत्साहबर्धक प्रतिक्रिया हेतु , बहुत बहुत आभार आदरणीय गिरिराज जी, आशीर्वाद व् स्नेह बनाये रखियेगा

सादर!

वाह वाह आदरणीय बहुत सुन्दर प्रयास है आपका .........................सुन्दर प्रस्तुति पर हार्दिक बधाई

आजकल बिना काम की व्यस्तता अधिक बढ़ गयी है बच्चों का बचपन सिमट गया है ...............न वो शोर रहा और न वो कलरव

नवयुग स्वार्थवादी परिकल्पना है जिसे लगभग सभी जी रहे हैं ,

अपनी यादें साझा करने के लिए बहुत बहुत धन्यवाद आदरणीय

आपका बहुत बहुत आभार आदरणीय संदीप जी, आप बिलकुल सच कह रहे है, // बच्चों का बचपन सिमट गया है ...............न वो शोर रहा और न वो कलरव//..अपना स्नेह यूँही बनाये रखियेगा..

सादर!

आदरणीय जितेन्द्र भार्इजी,  आंचलिक किवदंतियों का विचार रूप में सुन्दर संस्कार और सोददेश्य रचना के लिए तहेदिल से बहुत-बहुत बधार्इ स्वीकारें। सादर,

आपका बहुत बहुत आभार आदरणीय केवल जी, आपने मेरे प्रथम प्रयास पर ,अपना अमूल्य विचार देकर मेरे मनोबल को दोगुना किया, स्नेह व् आशीर्वाद बनाये रखियेगा..

सादर!

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