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कम उमिर में बियाह के फायदा (भोजपुरी व्यंग)
 

ललउ काका आजू खीस में आग भउरा भईल रहन, आपन बड़का लईका के मन भर गाजत रहन, हमरा बात ना बुझाइल त तनी देर उनुका दुवारी पर खाड़ होके सुने लगनी, तब समझ में बात आइल | दरअसल ललउ काका के पोती वंदना जवन एह साल इंटर में पढ़त बिया वोके उ स्कुल से आवत घरी वोकरे स्कुल में पढ़े वाला एगो लईका से बतियावत देख लिहले रहन | बात हमरा बुझा गइल रहे, काका के शांत करावे खातिर हम उनुका से कहनी कि चली काका मंदिर पर पंडी जी तोहरा के बोलावत बाड़न...आ उनुका के लिया के मंदिर के चउतरा पर बईठा दिहनी, फेनु चाह पीया के उनुका से कहनी, "का बात बा काका, काहे खिसियात रहल ह ?"

खिसियाये के बात बा त काहे ना खिसियाई , वन्दनवा के बाप से कहत रहनी कि वन्दनवा के बियाह कर दे पर वोकरा कुछ सुनाव तब नु, आज उ एगो लईका से बतियावत रहल हिया, खाप पंचायत वाला कवनो बुरबक बाडन सन जे कहत बाडन सन कि कमे उमर में लईकिन के बियाह कर देवे के चाहि जेसे लईकिन के बलात्कार ना होई | देख बबुआ हमार त इ कहनाम बा कि खाप पंचायत के हाई कोर्ट लेखा पावर होखे के चाहि अउरो सरकार के चाहि कि सामाजिक सरोकार से सम्बंधित नियम बनावे आ बनल नियमन में संशोधन के अधिकारों खाप पंचायत के मिले के चाहि | 
लेकिन काका कम उमिर में बियाह से त बहुते नुकसानों बा ....कुछो नुक्सान नईखे बबुआ, काका हमार बात बीचे में काटत बोलले, देख बबुआ कम उमिर में बियाह भईला से फायदा ही फायदा बा, लईका-लईकी के पसन् नापसन के समस्या ख़तम हो जाई, दिन प दिन सोना महंगा होत बा, दहेजों बढ़त जात बा, जेतना जल्दी बियाह हो जाई, वोतने कम पईसा में निपट जाई, लईका लईकिन पर बोझों कम पड़ी | अब उ टुनटुनवे के परथोक ले ले, वोकर बाप कमे उमिर में ओकर बियाह करा दिहलस | चालीस साल के उमिर में ही वोकर लईका २३ साल के हो गईल, आ सुननी ह कि कवनों बड़का कंपनी में नोकारियों करत बा, आजू ले टुनटुनवा के बाप वोके आ वोकर परिवार के कमाय- कमाय खियावत रहे आ अब वोकर लईका कमा के खियाई, आ दिनभर टुनटुनवा बाबू बन बईठकबाजी करत बा | बा कि ना, कमे उमिर में बियाह के फायदा ?  
परर काकाआ आ, अररर पररर छोड़ बबुआ हमनी के दुनिया देखले बानी जा, जब लईका १८ साल में वोट देके देश चलवा सकेला त घर ना ?
  • गणेश जी "बागी"
हमार पिछुलका पोस्ट => बात जवन भुलाला ना ( शिक्षक दिवस पर विशेष )

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Replies to This Discussion

परर काकाआ आ, अररर पररर छोड़ बबुआ हमनी के दुनिया देखले बानी जा, जब लईका १८ साल में वोट देके देश चलवा सकेला त घर ना ? 

 आदरणीय गणेश जी आपका यह कटाक्ष भरा आलेख   तकरीबन सारा ही समझ में आ गया है सामयिक व्यंग्य खाप पंचायत को लेकर बहुत ही रोचक अंदाज में लिखा है और ये अंतिम पंक्ति तो कटाक्ष की पराकाष्ठा है बहुत ही मजा आया पढ़ कर बहुत- बहुत बधाई आपको इस शानदार व्यंगात्मक आलेख के लिए 

आदरणीया राजेश कुमारी जी, व्यंग लेखन पर यह मेरा पहला प्रयास है, यदि आप तक सन्देश पहुँच रहा है तो मेरा लेखन सफल हुआ , बहुत बहुत आभार आपका |

बड़ी दम बा.... खासकर हेमें, त अऊरी, 'अररर पररर छोड़ बबुआ हमनी के दुनिया देखले बानी जा, जब लईका १८ साल में वोट देके देश चलवा सकेला त घर ना ? '.............  चापि के बधाई लीं !

सराहना खातिर बहुत बहुत आभार पियूष भाई |

बात त बरियार कइलऽ, ए गनेस भाई. बुला ई कुल्हि बतिया हमार बियहवा के घरिया निकहा कहाइल होखित. उहँ-उहँ.. आहियाहि.. !!

मज़ाक एक ओरे,  आजके हालत आ हालात प बहुत संवेदनशील कलम चलल बा, गनेस भाई.  हमरा ओरि से एह तलफ़त सवालन खातिर खूब बधाई चहुँपो.. .

सौरभ भईया, सराहे खातिर राउर धन्यवाद, कही ना कही इ व्यंग लिखे के पीछे शुभ्रान्शुओ बाबू के प्रेरणा बा, व्यंग लेखन पर इ पहिलुका प्रयास बा, पुनः आभार |

काहे न 

बधाई सर जी 

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