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Permalink Reply by DEEPAK SHARMA KULUVI on January 24, 2012 at 2:16pm bahut badiya va.......sir
kulluvi
Permalink Reply by Ravi Kumar Giri (Guru Jee) on January 24, 2012 at 2:34pm dhanyavad sir ji
Permalink Reply by आशीष यादव on January 24, 2012 at 3:18pm गुरु जी बहुते नीमन लिखलीं|
Permalink Reply by Ravi Kumar Giri (Guru Jee) on January 24, 2012 at 3:31pm dhanyavad bhai aashish ji
Permalink Reply by Neelam Upadhyaya on January 24, 2012 at 4:39pm Hamesha aisan bahute niman likhale bani.
Permalink Reply by Ravi Kumar Giri (Guru Jee) on January 25, 2012 at 1:11pm dhanyavad neelam di
Permalink Reply by Brij bhushan choubey on January 24, 2012 at 4:44pm
Permalink Reply by Ravi Kumar Giri (Guru Jee) on January 25, 2012 at 1:18pm dhanyavad brij bhushan ji
Permalink Reply by Saurabh Pandey on January 24, 2012 at 6:42pm कोलकाता के अबकी के प्रवास दौरान, बीस तारीख जनौरी, शुक्करवार दिना, रवि भाई, रउआ आ शकूर भाई से भेंट एगो यादगार मौका रहुए. मुलाकात घरिया एह रचना के पहिलुका रूप रेखा से रउआ हमरा परिचित करौले रहनीं. जइसन सभका पता बा, ई रचना के मूल ढंग ’कोलावरी डी..’ कुछ अउरिये ह ऽ. बाकिर रउआ त दारू के खिलाफ़ ओही सुर में एगो मूहिम के ढंग दे देले बानी. भाई, बहुत-बहुत बधाई.
Permalink Reply by Ravi Kumar Giri (Guru Jee) on January 25, 2012 at 1:20pm dhanyavad bhaiya hausla badhawe khatir
Permalink Reply by Sanjay Rajendraprasad Yadav on January 29, 2012 at 10:30am
Permalink Reply by Ravi Kumar Giri (Guru Jee) on January 30, 2012 at 10:48am dhanyavad sanjay ji
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