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व्यक्तिगत जीवन की व्यस्तताओं व विवशताओं के कारण पूर्व की भाँति न तो लिख पा रहा हूँ और न ही प्रतिक्रिया ही प्रकट कर पा रहा हूँ किन्तु ओबीओ पर पोस्ट रचनायें प्रतिदिन नियमित तौर पर पढ़ रहा हूँ. हाँ ! मासिक आयोजनों में सक्रिय रहने की यथा शक्ति कोशिश अवश्य कर रहा हूँ.

पहले हर सदस्य हर विधा पर प्रयासरत दिखता था.इन्हीं विविध विधाओं के कारण जहाँ यह मंच बहुरंगी छटा बिखेरता था वहीं मुझ जैसे रचनाकार ने भी कविता, गीत, छन्द, गज़ल, बाल गीत, आंचलिक गीत, लघु कथा जैसी विभिन्न विधाओं पर रचना कर पाने का गौरव प्राप्त किया.

इन रचनाओं की शुरुवात हुई सहज त्रुटियों के साथ फिर मंच के परस्पर सीखने-सिखाने के विशिष्ट तत्व के कारण वे परिमार्जित होती गईं."बहुत अच्छा" का गर्व तो नहीं किन्तु "कुछ अच्छा"  के आत्म विश्वास ने मुझे  अपने अंचल में भी पहचान दिलाई.

आज इस मंच पर न जाने क्यों मुझे एकरसता नजर आ रही है. जो जिस  विधा में लिख रहा है, वह उस विधा में ही रमा हुआ नजर आ रहा है. पहले सा बहुरंगी वातावरण न जाने क्यों मुझे नहीं दिखाई दे रहा है.

हो सकता है मेरा भ्रम हो. आप सुधि पाठकों से अनुरोध कर रहा हूँ कि अपने विचार प्रकट कर मेरे भ्रम का निवारण करने में मेरी सहायता करेंगे.

एक बात और ...जो मित्र "सुझाव शिकायत" समूह में इसी विषय पर अपनी टिप्पणी दे रखी है कृपया वहाँ से कॉपी कर यहाँ पेस्ट कर लें. 

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कोई मंच हो या संस्था, अपने आप उसे दिशा नहीं मिलती जिसके प्रति वह उद्येश्य ठानती हुई आगे बढ़ती है. उसे सचेष्ट दिशा देनी होती है. इसमें महती भूमिका निभाते हैं उसके कर्ता-धर्ता जिनके ऊपर संचालन-क्रियान्वयन-संपादन का दायित्व है. यह अवश्य है कि व्यक्तिगतजीवन के आग्रह बहुत ही प्रभावी होते हैं. लेकिन प्रबन्ध और कार्यकारिणी के सदस्यों ने तो यह दायित्व सोच-समझ कर ही स्वीकार किया है, यही सत्य है.

यदस्माभिरंगीकृतं पूर्ण्यकार्यम्
तवैवाशिषा पूर्णतां तत्त्प्रयातु .. अर्थात,
हमने स्वयं ही इस पूण्यकार्य को स्वीकार ही नहीं अंगीकार किया है जो ’उस’ के आशीष से पूर्णता को प्राप्त करेगा.

आज कहना प्रासंगिक ही नहीं सोचना समीचीन होगा, कि किसी न किसी ’कारण’ के वशीभूत प्रबन्धन और कार्यकारिणी के कितने सदस्य अनुपस्थित है या उपस्थितिविक्रम से प्रभावित हैं. क्या उन्हें अपने दायित्व के प्रति संवेदना है ?

जब कोई कार्य ’वही-वहीपन’ से भरा प्रतीत होने लगे तो उसके प्रति अरुचि पैदा होने लगती है. हमे इस विन्दु पर आकर सोचना होगा कि ऐसी अरुचि क्यों पैदा हो रही है.

वे कौन से ’कारक’ हैं जो सामान्य सदस्य तो छोड़िये, मानद पदाधिकारियों तक को अपने बहाव में ले जा रहे हैं ? इसके बाद ही, समरस माहौल की बात प्रासंगिक लगेगी, ऐसा मेरा मानना है.

यह मंच ’खुले’ किन्तु ’शिष्ट’ वाद-विवाद का मंच है. ऐसा क्यों होता है कि एक नया सदस्य ’सीखने’ के दौरान समस्त भावनाओं को स्वीकार करता है लेकिन कुछ विन्दुओं की जानकारी प्राप्त करते ही उसे बातें ’सतही लगने’ लगती हैं ? क्या उस सदस्य का हेतु कुछ विन्दुओं की जानकारी मात्र है, ताकि वह अन्य साइटों या भौतिक मंचों पर शब्द-कौतुक कर सके ?

आदरणीय श्री  arun kumar nigam जी सार्थक चर्चा , लोंक तंत्र जीवित है . सादर बधाई , साहित्य  विकास में सक्रिय योगदान हेतु. और एक चेतावनी भी . साहित्य बचाव हेतु , 

ऐसी परिचर्चा पर सार्थक बहस का न होना उचित नहीं है.

सद्यः समाप्त आयोजन (’चित्र से काव्य तक’ छन्दोत्सव) में प्रबन्धन और कार्यकारिणी के कितने सदस्य सक्रिय हुए ? प्रधान सम्पादक आदरणीय योगराजभाईजी ने फोन पर मुझे अपनी परेशानी बतायी कि उनके ब्राउजर से ओबीओ का पेज नहीं खुल रहा है. आदरणीय गिरिराज भण्डारीजी की अनुपस्थिति का आशय उनकी प्रस्तुति के साथ आ गया था.

कमोबेश ऐसे ही व्यक्तिगत अपरिहार्य कारणों से सक्रियता प्रभावित होती है. और बाद में ऐसी अनुपस्थितयाँ सामुहिक हो जाती हैं तो मंच की कुल गतिविधि ही प्रभावित हुई दिखने लगती है.

यह मेरा आकलन मात्र है. मैं गलत भी हो सकता हूँ.

आदरणीय सौरभ सर, आपने बिलकुल सही कहा, इस परिचर्चा पर सार्थक बहस जारी रहनी चाहिए. इस बार के चित्र से काव्य तक’ छन्दोत्सव में प्रबन्धन और कार्यकारिणी के सदस्यों और कई कई सक्रीय सदस्यों की अनुपस्थिति से आयोजन में एक रिक्तता का आभास होता रहा है. कारण बहुत से हुआ करते है. फिर भी उम्मीद करते है आगे होने वाले आयोजनों में ऐसा आभास नहीं होगा. सादर 

उम्मीद पर ही तो दुनिया कायम है, भाईजी..

:-))

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