आदरणीय काव्य-रसिको !
सादर अभिवादन !!
’चित्र से काव्य तक’ छन्दोत्सव का यह एक सौ अठहत्तरवाँ आयोजन है।
छंद का नाम - दोहा छंद
आयोजन हेतु निर्धारित तिथियाँ -
18 अप्रैल’ 26 दिन शनिवार से
19 अप्रैल’ 26 दिन रविवार तक
केवल मौलिक एवं अप्रकाशित रचनाएँ ही स्वीकार की जाएँगीं.
दोहा छंद के मूलभूत नियमों के लिए यहाँ क्लिक करें
जैसा कि विदित है, कई-एक छंद के विधानों की मूलभूत जानकारियाँ इसी पटल के भारतीय छन्द विधान समूह में मिल सकती हैं.
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आयोजन सम्बन्धी नोट :
फिलहाल Reply Box बंद रहेगा जो आयोजन हेतु निर्धारित तिथियाँ :
18 अप्रैल’ 26 दिन शनिवार से
19 अप्रैल’ 26 दिन रविवार तक रचनाएँ तथा टिप्पणियाँ प्रस्तुत की जा सकती हैं।
अति आवश्यक सूचना :
छंदोत्सव के सम्बन्ध मे किसी तरह की जानकारी हेतु नीचे दिये लिंक पर पूछताछ की जा सकती है ...
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मंच संचालक
सौरभ पाण्डेय
(सदस्य प्रबंधन समूह)
ओपन बुक्स ऑनलाइन डॉट कॉम
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पका न पाती रोटियाँ, भले युद्ध की आग
जला रही है नित्य पर, वह निर्धन का भाग।।..... वाह ! प्रदत्त चित्र छान्दोत्सव में आने के कारण पर सटीक दोहा रचा है आपने.
आदरणीय भाई लक्ष्मण धामी जी सादर, आपने युद्ध शब्द से दोहा प्रारम्भ करने की हैट्रिक लगाईं है. किन्तु केवल युद्ध की ही बात नहीं है. आत्मनिर्भर होने के लिए हमें विकल्प की तरफ मुड़ना पडेगा. भारत सक्षम देश है हर आपदा से लड़ने में यह कुछ वर्ष पूर्व उसने साबित भी कर दिखाया है. आवश्यकता इच्छाशक्ति की है.प्रदत्त चित्र पर आपने सभी दोहे सुन्दर रचे हैं. हार्दिक बधाई स्वीकारें. सादर
आदरणीय लक्ष्मण भाईजी
विस्तार से आपने वर्तमान स्थिति और चित्र के अनुरूप दोहे की रचना की है। हार्दिक बधाई।
आदरणीय सौरभ भाई की हर दोहे पर सार्थक टिप्पणी हम सभी के लिए है।
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पका न पाती रोटियाँ, भले युद्ध की आग
जला रही है नित्य पर, वह निर्धन का भाग।।//वाह.. सत्य कथन। आदरणीय भाई लक्ष्मण धामी जी। चित्रानुकूल बहुत सुन्दर दोहों का सृजन हुआ है। हार्दिक बधाई स्वीकार करें
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दोहा छंद
प्रथम दोहे की पहली पंक्ति कृपया इस तरह पढ़ें / बाँध साइकिल लकड़ियाँ, वृद्ध चला घर ओर/
आदरणीया प्रतिभाजी,
चित्र अनुरूप सुंदर दोहे। हार्दिक बधाई।
अंधेर का अर्थ अत्याचार अन्याय होता है ... अँधेरा नहीं।
आदरणीय अखिलेश जी
हार्दिक आभार आपने त्रुटि की तरफ ध्यान दिलाया। ये पंक्ति इस तरह होनी चाहिए/ अंधेरा दीपक तले/
आदरणीय अशोक जी
हार्दिक आभार इस उत्साहवर्धन के लिए
आ. प्रतिभा बहन, सादर अभिवादन। चित्रानुरूप सुंदर दोहे हुए हैं। हार्दिक बधाई।
दोहे
चलती तब भी साइकिल, चले नहीं जब कार।
हिन्दुस्तानी हम कभी, नहीं मानते हार।।
संकट आया गैस का, लाए उपले काठ।
दो दिन चूल्हा फूँककर, हुए कहाँ कम ठाठ।।
हॉकर है वह गैस का, लगता तभी अजीब।
सोचो तो वह जा रहा, लकड़ी लिए गरीब।।
कहाँ गरीबों के लिए, साधन हैं उपलब्ध।
वह तो जीते उस तरह, जैसा हो प्रारब्ध।।
लड़ने संकट से हमें, रहना है तैयार।
गला काटने गैस फिर, बने नहीं हथियार।।
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~ मौलिक/अप्रकाशित.
लड़ने संकट से हमें, रहना है तैयार।
गला काटने गैस फिर, बने नहीं हथियार।।// जी बिल्कुल, विपदा टली नहीं है अभी। आदरणीय अशोक जी, प्रदत्त चित्र पर बहुत सुन्दर दोहों का सृजन हुआ है।हार्दिक बधाई स्वीकार करें।
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