आदरणीय काव्य-रसिको !
सादर अभिवादन !!
’चित्र से काव्य तक’ छन्दोत्सव का यह एक सौ छिहत्तरवाँ आयोजन है।
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छंद का नाम - चौपाई छंद
आयोजन हेतु निर्धारित तिथियाँ -
21 फरवरी’ 26 दिन शनिवार से
22 फरवरी’ 26 दिन रविवार तक
केवल मौलिक एवं अप्रकाशित रचनाएँ ही स्वीकार की जाएँगीं.
चौपाई छंद के मूलभूत नियमों के लिए यहाँ क्लिक करें
जैसा कि विदित है, कई-एक छंद के विधानों की मूलभूत जानकारियाँ इसी पटल के भारतीय छन्द विधान समूह में मिल सकती हैं.
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आयोजन सम्बन्धी नोट :
फिलहाल Reply Box बंद रहेगा जो आयोजन हेतु निर्धारित तिथियाँ -
21 फरवरी’ 26 दिन शनिवार से 22 फरवरी’ 26 दिन रविवार तक रचनाएँ तथा टिप्पणियाँ प्रस्तुत की जा सकती हैं।
अति आवश्यक सूचना :
छंदोत्सव के सम्बन्ध मे किसी तरह की जानकारी हेतु नीचे दिये लिंक पर पूछताछ की जा सकती है ...
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मंच संचालक
सौरभ पाण्डेय
(सदस्य प्रबंधन समूह)
ओपन बुक्स ऑनलाइन डॉट कॉम
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चौपाई छंद
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करे मरम्मत जूते चप्पल। काम नित्य का यही आजकल॥
कटे फटे सब को सीता है। सदा अभावों में जीता है॥
काम नकद का नहीं उधारी। कारण यही काम है जारी॥
बहस नहीं करते नर नारी। धंधे में रखता ना यारी॥
आस नहीं मैं करता जिनसे। इज्जत ज्यादा मिलती उनसे॥
जब भी यहाँ विदेशी आते। बिन मांगे ज्यादा दे जाते॥
बंद दुकान बना है डेरा। बाकी समय लगाता फेरा॥
जब दुकान के मालिक आते। डेरा डंडा सब उठ जाते॥
गुमटी शासन से मिल जाए। जीवन में खुशियाँ भर आए॥
काम चलेगा बारह मासी। ना अभाव न होगी उदासी॥
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मौलिक अप्रकाशित
शुभ प्रभात, आदरणीय!
चौपाई छंद:
भेदभाव सच सदा न होता
वर्ग- भेद कभी सच न होता
मोची अपना कर्म करेगा
सन्यासिन जन भेद करेगा
माँग हमेशा जननी होती
आपूर्ति जरूरत की होती
मनुज भाव बराबरी होती
कर्म अनुरूप परिणति होती
कर्म प्रथम धर्म मनुज माना
वही पूजा भगवान माना
चर्मकार ईश अवतार हुआ
श्री कृष्ण ने जताया माना
व्यवसाय ही स्वधर्म हुआ है
वहाँ ब्रह्म का दर्श हुआ है
भक्ति भाव ही कर्म हुआ है
यही ईश का कथन हुआ है
मौलिक व अप्रकाशित
21-02-2026
चौपाई
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बन्द शटर हैं खुला न ताला।। दृश्य सुबह का दिखे निराला।।
रूप मनोहर सुन्दर छोरी।। मोची ढिग आ बैठी गोरी।।
हरदिन सुबह न कोई आता।। मोची कोई काम न पाता।।
किन्तु आज दिन ऐसा आया।। मोची ने भी अवसर पाया।।
सुबह-सुबह है चप्पल टूटी।। गोरी की है किस्मत फूटी।।
बैठी वह चप्पल सिलवाने।। आयी मुश्किल दूर भगाने।।
रूप चन्द्र ज्यों पूरनमासी।। किन्तु नहीं यह भारतवासी।।
किसी संत की लगती चेरी।। बात सत्य यदि मानों मेरी।।
अधरों अति सुन्दर स्मित फैली।। साथ लिए बैठी इक थैली।।
एक पाँव है चप्पल धारी।। दूजे सहती ठण्डक भारी।।
सोच रही झटपट मैं जाऊँ।। मन्दिर जा ईश्वर को ध्याऊँ।।
दिन चढ़ आता है यह सिर पर।। भली करें अब सारी ईश्वर।।
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~ मौलिक/अप्रकाशित.
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