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Saurabh Pandey's Comments

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At 1:00pm on May 26, 2019, dandpani nahak said…
परम आदरणीय सौरभ पाण्डेय जी आदाब मैं बता नहीं सकता कितना खुश हूँ कि मेरी रचना को आपने सराहा बहुत शुक्रिया आगे भी आपका स्नेह मिलता रहेगा ऐसी आशा करता हूँ
At 8:21pm on October 22, 2017, Ramkunwar Choudhary said…
आप को सादर प्रणाम, मैं पहली बार कुछ लिखने का प्रयास कर रहा हूँ। मैंने भुजंगप्रयात छंद के आधार पर कुछ लिखने का प्रयास किया है। भाव, सौंदर्य, मात्राओं आदि की त्रुटियां बताकर मेरा मार्गदर्शन करें। मैं आपका आभारी रहूँगा..................
जहाँ ये दिलों की दगा का अखाड़ा,
किसी ने मिलाया किसी ने पछाड़ा;
यहाँ प्यार है बेसहारा बगीचा,
किसी ने बसाया किसी ने उजाड़ा;
At 7:09pm on January 3, 2016, Sushil Sarna said…

नूतन वर्ष 2016 आपको सपरिवार मंगलमय हो। मैं प्रभु से आपकी हर मनोकामना पूर्ण करने की कामना करता हूँ।

सुशील सरना

At 5:11pm on December 3, 2015, मोहन बेगोवाल said…

आदरणीय सौरभ जी, आप जी को जन्मदिन की बहुत बहुत बधाई हो 

At 3:57am on December 3, 2015,
सदस्य कार्यकारिणी
मिथिलेश वामनकर
said…

At 9:54am on October 2, 2015, सतविन्द्र कुमार राणा said…
पूजनीय सौरभ पाण्डेय सर मैं आपके द्वारा दिए गए सुझावों एवम् मार्गदर्शन के लिए कृतार्थ हूँ।"चुप्पी" इस मञ्च पर मेरी प्रथम प्रस्तुति है।आप सब सुधिजनों के सानिध्य में आया एक नव विद्यार्थी हूँ।आपके मार्गदर्शन का सदैव आकांक्षी रहूँगा।मेरी रचना के अवलोकन एवम् समीक्षा के लिए हार्दिक आभार।
At 8:07pm on July 20, 2015, Sushil Sarna said…

आदरणीय सौरभ जी नमस्कार --- सर आपके द्वारा इस दोहे को "मेघ मिलें जब मेघ से, शोर करें घनघोर,प्रेम गीत बजने लगें, सृष्टि में चहूँ और"
वैधानिक रूप से सही नहीं माना। द्वितीय पंक्ति के सम चरण में 'चहूँ' को यदि 'चहुं ' से सही कर दिया जाए तो मात्रिक ह्रास नहीं होगा और त्रुटि सही हो जाएगी। क्या यही वैधानिक त्रुटि है या कोई ओर ?कृपया मेरी जिज्ञासा को शांत करें ताकि भविष्य में इस तरह की त्रुटि से बचा जा सके।
सादर …

At 5:17am on March 18, 2015,
सदस्य कार्यकारिणी
मिथिलेश वामनकर
said…

आदरणीय सौरभ सर, वाल पर आपकी उपस्थिति ने श्रम को सार्थक कर दिया. वाल के कलेवर पर मिली पहली प्रतिक्रिया है.  आपके आशीर्वाद और शुभकामनाओं के लिए हार्दिक आभारी हूँ . नमन 

At 10:58am on February 17, 2015, लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' said…

आ. भाई सौरभ जी,सादर अभिवादन । नगर से बाहर होने के कारण परिसंवाद में उपस्थित न हो पाने व आपसे रूबरू न हो पाने का मलाल रहेगा । पहले उम्मीद थी कि सुबह तक वापसी सभ्भव हो जाएगी । किंतु किसी कारणवश नहीं पहुच सका । इस कारण अपनी उपस्थिति सम्भव नहीं हो पायी । क्षमा प्रार्थी हूँ ।

At 3:26pm on January 3, 2015, Sushil Sarna said…

आदरणीय सौरभ जी आपको सपरिवार नव वर्ष की हार्दिक शुभकामनाएं।  प्रभु से प्रार्थना है कि आने वाला हर पल आपके और परिवार के लिए मंगलमय हो। 

At 7:25am on November 21, 2014, Rahul Dangi Panchal said…
समझाने के लिए सादर धन्यवाद सौरभ जी!
At 10:00pm on November 20, 2014, Rahul Dangi Panchal said…
आथ व आत सही है क्या ? क्या एेसे कर सकते है
At 9:59pm on November 20, 2014, Rahul Dangi Panchal said…
आदरणीय सौरभ जी राहत जी के इस अश्आर में काफिया निर्धारण समझाने की क्रपा करें!

सूरज सितारे चाँद मेरे साथ मेँ रहे
जब तक तुम्हारे हाथ मेरे हाथ में रहे

शाख़ों से टूट जायें वो पत्ते नहीं हैं हम
आँधी से कोई कह दे कि औक़ात में रहे
At 1:00pm on November 9, 2014, Rahul Dangi Panchal said…
सादर धन्यवाद!
At 10:46am on November 9, 2014, Rahul Dangi Panchal said…
आदरणीय सौरभ जी बहुत बहुत आभार आपका ! मेरा मनोबल बढाने के लिए !
गीत की एक छोटी सी कोशिश आपको दिखाना चाहता हुँ! जो Facebook के एक ग्रुप में प्रकाशित हो चुकी है! सादर!
इसमें (गुनाह) में ह की मात्रा जादा हो गयी है !


मुखडा मापनी-२२२२१२२ २२२२१२२
अन्तरा मापनी-२२२२१२२ २२१२२२२
-------------------------------------------------
ना उसका कुछ गुनाह है, ना दिल की ही खता है!
ना इसमें ये जहाँ है,ये सब मेरा किया है!
सब मेरी गलतियाँ है, सब मेरी गलतियाँ है!!

मुझको भी लाश होना,इक रोज वो भी सोना!
जीवन है एक खिलौना,बेबात का है रोना!
फिर क्यूं मेरे ये आँसू, थामे नहीं ये थमते!
ये गम की सर्दियों में, भी क्यूं नहीं है जमते!
रब माने था जिसे दिल, अब तक भी पूजता है!
इक है वो साँप यारों,बस विष ही थूकता है!!
सब मेरी गलतियाँ है, सब मेरी................

इक पल को भी ना हटना,हर वक्त उसको तकना!
बिल्कुल भी जी न भरना,बस देखतें ही रहना!
हर शय पे हर जगह पे,बस नाम उसका लिखना!
मेजों पे दिल बनाना,फिर टीचरों पे पिटना!
बीता मेरा हुआ कल,मुझको कुरेदता है!!
नाकामी,आशिकी की 'राहुल' ये दासताँ है!!
सब मेरी गलतियाँ है, सब मेरी................
At 5:54pm on November 8, 2014, Rahul Dangi Panchal said…
आदरणीय एक उलझन है ! क्या गीत में अन्तरे की पुरक पंक्ति जिसका तुकान्त टेक के तुकान्त के समान होता है! क्या हम उस पंक्ति को न लिख कर अन्तरे के अन्त में केवल टेक ही लगा सकते है या नहीं ! क्यूं कि मैने कुछ गीतो में ऐसा देखा है! पता नहीं वे गीत ही है या कोई अोर विधा ! क्रपया बताने का कष्ट करें! सन्रम!
At 7:20pm on November 7, 2014, Rahul Dangi Panchal said…
आदरणीय addmin जी विन्रम निवेदन है!

मै पहले की तरह गजल की क्लाश के शुरुआती प्रष्ठ नहीं पढ़ पा रहा हुँ ! केवल comments ही पढ़ पा रहा हुँ!
आदरणीय मेरी समस्या का समाधान करें!
At 4:39pm on October 23, 2014, Sushil Sarna said…

आपको  सपरिवार ज्योति पर्व की हार्दिक एवं मंगलमय शुभकामनाएं...

At 11:49am on September 6, 2014, डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव said…

आदरणीय सौरभजी

महनीया सीमा जी के हिन्दी नवगीत पर मेरी टिप्पणी के निहितार्थ भी होंगे  इस सम्भावना  पर मैंने शायद उस समय विचार नहीं किया I  जो बात मन में आयी  वैसे ही कह दी I इससे सीमा जी को भी आघात लगा होगा i मै आपसे और सीमा जी  दोनों से क्षमा प्रार्थी हूँ I  मेरा अनुरोध है कि -'' सार सार को गहि रहे थोथा देय उडाय i''

सादर i

At 9:41pm on August 7, 2014, पं. प्रेम नारायण दीक्षित "प्रेम" said…
प्रिय पाण्डेय जी मुक्तको के प्रति आपके समालोचनात्मक चिंतन के प्रति साधुबाद। फिर कई सूत्र नई धुन के रुई निकले है के प्रति मेरा यह कहना है की रुई सूत्रो का राशि पिंड है जिसमे रुई एकवचन है और सूत्र बहुवचनांत ;जैसे सूर्य किरणो का राशि पिंड है सूर्य एकवचन और किरणे बहुवचनान्त। सूर्य में अनेको किरणे समाहित है इसी प्रकार रुई में अनेको सूत्र समाहित है। स्त्री लिंग रुई के रेशे को कात कर जो सूत्र बनता है वह पुल्लिंग हो जाता है।

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