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मेरे  वतन पे  आते हैं सारे जहाँ से लोग - सलीम रज़ा रीवा

221 2121 1221 212
.......
मेरे  वतन  में  आते  हैं  सारे  जहाँ  से लोग.
रहते हैं इस ज़मीन पे अम्न-ओ-अमाँ से लोग.
..
लगता है कुछ खुलुसो  महब्बत मे है कमी.
क्यूं उठ के जा रहे हैं बता दरमियाँ से लोग.
..
तेरा  ख़ुलूस  तेरी  महब्बत  को  देखकर.
जुड्ते  गये हैं आके  तेरे  कारवाँ  से लोग.
..
कैसा  ये  कह्र   कैसी   तबाही   है    खुदा.
बिछ्डे हुए हैं अपनो से अपने मकाँ से लोग.
..
हिन्दी अगर है जिस्म तो उर्दू है उसकी जान .
करते  हैं  प्यार आज भी  दोनों ज़बाँ से लोग.
..
नज़्र-ए-फ़साद  होता रहा घर  मेरा '' रज़ा ''
निकले नहीं मुहल्ले में अपने मकां से लोग.
...........
मौलिक एवं अप्रकाशित

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Comment

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Comment by SALIM RAZA REWA on October 4, 2017 at 11:04am
आ. संदीप कुमार जी,
आपकी मुहब्बत के लिए बहुत बहुत शुक्रिया,
Comment by SALIM RAZA REWA on October 4, 2017 at 11:03am
आ. राजेश कुमारी जी,
आपकी नज़रे इनायत के लिए शुक्रिया,
Comment by Nilesh Shevgaonkar on October 4, 2017 at 10:57am

वाह वा , बहुत उम्दा ग़ज़ल हुई है,,,
बधाई 


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on February 6, 2013 at 7:43am

कैसा ये कहर कैसी तबाही है या खुदा !!
बिछ्डे हुए हैं अपनो से अपने मकाँ से लोग !!

एक अच्छी ग़ज़ल में बहुत अच्छा शेर हुआ है. बधाई, सलीम रज़ा साहब.

एक बात : अहले आदब या अहले अदब ? मिसरे के २२१ २१२१ १२२१ २१२ के वज़्न के लिजाज़ से भी.

Comment by SANDEEP KUMAR PATEL on February 5, 2013 at 7:32pm

क्या बात है बेहतरीन ग़ज़ल कही है मुबारक हो


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on February 5, 2013 at 12:59pm
लगता है कुछ खुलुसो मोहब्बत मे है कमी !!
क्यूं उठ कर जा रहे हैं तेरे दरमियाँ से लोग !! ---बहुत शानदार  शेर कहा वैसे पूरी ग़ज़ल ही शानदार है पहली बार आपकी ग़ज़ल सामने आई दाद कबूल करें रज़ा जी 

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