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निछावर जिसपे मैंने ज़िंदगी की- ग़ज़ल

मुफ़ाइलुन मुफ़ाइलुन फ़ऊलुन
1222 1222 122
हज़ज मुसद्दस महजूफ़
———————————
निछावर जिसपे मैंने ज़िंदगी की,
उसे पर्वा नहीं मेरी ख़ुशी की
*
समझता ही नहीं जो दर्द मेरा,
निगाहों ने उसी की बंदगी की
*
वही इक शख़्स जो कुछ भी नहीं है,
हर इक मुश्किल में उसने रहबरी की
*
उसी का रंग है मेरे सुख़न में,
उसी से आबरू है शायरी की
*
उजाले गिर पड़े क़दमों पे आकर,
अंधेरों से जो मैंने दोस्ती की
*
अदीबों में है मेरा नाम शामिल,
मेरी आदत नहीं है मस्ख़री की
*
उसे पागल बना डाला किसी ने,
कभी जो अबरू थी इस गली की
*
हरिक ज़र्रे का जो ख़ालिक है यारो,
इबादत कर रहा हूँ मैं उसी की
—— सलीम “रज़ा”
मौलिक व अप्रकाशित

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Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on December 16, 2023 at 1:32pm

अच्छी ग़ज़ल कही सलीम रजा साहिब...7वे शेर में सही शब्द "अबरू होगा या आबरू"?जानकारी के लिए?

Comment by SALIM RAZA REWA on November 7, 2023 at 8:29pm

 आपकी  महब्बत का बेहद शुक्रगुज़ार हूँ,

मोहतरम लक्ष्मण धामी साहब,

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on November 5, 2023 at 11:03pm

आ. भाई सलीम जी, अभिवादन। सुन्दर गजल हुई है। हार्दिक बधाई।

Comment by SALIM RAZA REWA on October 27, 2023 at 8:04am

मोहतरम  समर कबीर साहब ,

आपकी पुर-ख़ुलूश महब्बत के लिए दिल से मम्नून हूँ,

Comment by Samar kabeer on October 25, 2023 at 10:52pm

जनाब सलीम रज़ा साहिब आदाब, काफ़ी समय बाद ओबीओ पर आपकी ग़ज़ल देख कर मसर्रत हुई ।

ग़ज़ल के सभी अशआर ख़ूब हुए,इस ग़ज़ल पर मेरी मुबारकबाद क़ुबूल फरमाएँ ।

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