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ग़ज़ल : ज़रा  सोचिए दिल लगाने से पहले : SALIM RAZA REWA

122 122 122 122
....
ज़रा सोचिए दिल लगाने से पहले.
चराग़-ए-मोहब्बत जलाने से पहले.
.
बहारों का इक शामियाना  बना  दो.
ख़िज़ाओं को गुलशन में आने से पहले.
.
गिरेबान में  झांक  कर अपने देखो.
किसी पर भी उंगली उठाने से पहले.
.
ग़रीबों की आहों से बचना है मुश्क़िल.
ये तुम सोच लो दिल दुखाने से पहले.
.
कभी चल के शोलों पे देखो रज़ा तुम.
महब्बत की बस्ती जलाने से पहले.
.. मौलिक व अप्रकाशित

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Comment by SALIM RAZA REWA on Tuesday
जनाब तस्दीक साहब.
मेरी इस ग़ज़ल को भी महब्बत से नवाज़े..
Comment by SALIM RAZA REWA on Monday
आ. लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'जी,
आपकी नज़रे इनायत के लिए शुक्रिया शुक्रिया,
Comment by SALIM RAZA REWA on Monday
आ. बृजेश जी,
आपकी नज़रे इनायत के लिए शुक्रिया.
Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on Monday
आ. भाई सलीम जी, सुंदर गजल हुई है । हार्दिक बधाई ।
Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on Sunday
खूबसूरत ग़ज़ल हुई आदरणीय...सादर
Comment by SALIM RAZA REWA on October 15, 2017 at 5:25pm
जनाब समर साहब
आपकी नज़रे इनायत के लिए शुक्रिया,
ताब्दीली कर दी जाएगी...
Comment by Samar kabeer on October 15, 2017 at 5:18pm
जनाब सलीम रज़ा साहिब आदाब,अच्छी ग़ज़ल हुई है,दाद के साथ मुबारकबाद पेश करता हूँ ।
मतले के सानी मिसरे में 'मोहब्बत' को "महब्बत" कर लें ।

दूसरे शैर के सानी मिसरे में 'ख़िज़ाओं को' की जगह "ख़ज़ाओं के" कर लें ।
Comment by SALIM RAZA REWA on October 15, 2017 at 3:48pm
आ. वन्दना जी,
आपकी नज़रे इनायत के लिए शुक्रिया.
Comment by vandana on October 15, 2017 at 3:23pm

बहुत सुन्दर ग़ज़ल आदरणीय सलीम साहब 

Comment by SALIM RAZA REWA on October 15, 2017 at 10:12am

आदरणीय अजय तिवारी  जी ,
आपकी मुहब्बत सलामत रहे बहुत बहुत शुक्रिया ,

कृपया ध्यान दे...

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