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टुकड़ों में बटा आदमी - डॉo विजय शंकर

टुकड़ों में बटा आदमी 

टुकड़ों की बात करता है , 

टुकड़ों को छोटे , और छोटे 

टुकड़ों में तोड़ने की बात करता है।  

टुकड़ों से अलग अलग बात करता है , 

आज इसकी कल उसकी बात करता है 

पर टुकड़ों को जोड़ने से डरता है 

और टुकड़ों के खुद जुड़ने से भी डरता है। 

मौलिक एवं अप्रकाशित 

 

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Comment

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Comment by Dr. Vijai Shanker on October 14, 2018 at 12:35am

आदरणीय सुरेंद्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप जी , आपका ह्रदय से आभार एवं धन्यवाद, सादर।

Comment by नाथ सोनांचली on October 13, 2018 at 8:44am

आद0 डॉ विजय शंकर जी सादर अभिवादन। बढिया भाव सम्प्रेषण के लिए बधाई निवेदित है।

Comment by Dr. Vijai Shanker on October 11, 2018 at 6:04pm

आदरणीय डाo छोटे लाल जी ,आपका ह्रदय से आभार एवं धन्यवाद , सादर।

Comment by Dr. Vijai Shanker on October 11, 2018 at 6:01pm

आदरणीय बृजेश कुमार जी , हार्दिक आभार एवं धन्यवाद , सादर।

Comment by डॉ छोटेलाल सिंह on October 11, 2018 at 5:57pm

वाह डॉ साहब बहुत ही यथार्थ परक जीवंत पंक्तियाँ बधाई कुबूल कीजिए

Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on October 11, 2018 at 11:36am

अच्छी सारगर्भित कविता..

Comment by Dr. Vijai Shanker on October 11, 2018 at 4:17am

आदरणीय अजय तिवारी जी , हार्दिक आभार एवं धन्यवाद , सादर।

Comment by Ajay Tiwari on October 10, 2018 at 5:41pm

आदरणीय विजय जी, बहुत अच्छी कविता हुई है. हार्दिक बधाई 

Comment by Dr. Vijai Shanker on October 10, 2018 at 8:26am

आदरणीय समर कबीर साहब , नमस्कार , आपकी सद्भवनाओं से परिपूर्ण विवेचना के लिए ह्रदय से आभार एवं बधाई के लिए बहुत बहुत धन्यवाद , सादर।

Comment by Dr. Vijai Shanker on October 10, 2018 at 8:20am

आदरणीय तेजवीर सिंह जी ,आपकी सद्भवनाओं के लिए आभार एवं बहुत बहुत धन्यवाद , सादर।

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