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गीतिका .....8 + 8---निगाहें

आँज गगन का नील निगाहें

लगती गहरी झील  निगाहें

 

माँस बदन पर दिख जाये तो

बन जाती है चील निगाहें

 

आन टिकी है मुझ पर सबकी

चुभती पैनी कील निगाहें

 

बंद गली के उस नुक्कड़ पर

करती है क्या डील निगाहें

 

इक पल में तय कर लेती है

यार हज़ारों मील निगाहें

 

बाँध सकेगा मन क्या इनको

देती मन को ढील निगाहें

 

दिखने दे ‘खुरशीद’ नज़ारे

किरणों से मत छील निगाहें 

मौलिक व अप्रकाशित 

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Comment by khursheed khairadi on February 19, 2015 at 9:49am

आदरणीय महर्षि त्रिपाठी जी ,आदरणीय सोमेश जी ,हृदय तल से आभार |सादर |

Comment by Hari Prakash Dubey on February 19, 2015 at 8:31am

 आदरणीय खुर्शीद खैरादी जी ,बहुत सुन्दर ,

बंद गली के उस नुक्कड़ पर

करती है क्या डील निगाहें//...वाह,  बधाई, सादर।

Comment by Dr. Vijai Shanker on February 19, 2015 at 3:24am
इक पल में तय कर लेती है , यार हज़ारों मील निगाहें
बाँध सकेगा मन क्या इनको , देती मन को ढील निगाहें ॥
वाह, सुन्दर , बहुत सुन्दर , आदरणीय खुर्शीद खैरादी जी , बधाई, सादर।

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on February 19, 2015 at 12:05am

आदरणीय खुर्शीद सर बेहतरीन ग़ज़ल हुई है शेर दर शेर दाद कुबूल फरमाए. सभी अशआर एक से बढ़कर एक है .... क्या कमाल का काफिया लिया है, आपकी ग़ज़लों का इसीलिए दीवाना हूँ.... ...... आपकी ग़ज़ल पर ही तरही ग़ज़ल का प्रयास कर रहा हूँ आपकी ग़ज़ल के हवाले से ये चंद अशआर आपको  सादर समर्पित  है -

क्या क्या करती फील निगाहें 

गीली गीली सील निगाहें  

तेरी बातें, मेरी बातें 

करती है तफसील निगाहें 

खुशियाँ खुशियाँ केवल खुशियाँ 

कितनी है तहवील निगाहें 

मेरी बातें सुनकर ऐसे 

मत करिए तब्दील निगाहें 

इस दिल से उस  दिल तक बातें 

करती है तामील निगाहें 

कोमल दिल को रोज डराती 

"चुभती पैनी कील निगाहें"

Comment by Samar kabeer on February 18, 2015 at 10:53pm
जनाब ख़ुर्शीद जी,आदाब,मतला कुछ कमज़ोर लग रहा है,ग़ज़ल के बाक़ी अशआर बहुत ख़ूब हैं,मुबारकबाद क़ुबूल फ़रमाऐं |

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on February 18, 2015 at 8:29pm

बहुत सुन्दर वाह्ह्ह निगाहों के हर हुनर को गीतिका में बांधा है बहुत अच्छी लिखी है बहुत बहुत बधाई ,बहुत पहले मैंने आँखों के ऊपर इसी तरह कुछ लिखा था बरबस ही  याद आ गया. 

Comment by somesh kumar on February 18, 2015 at 6:39pm

निगाहों ने निगाहों से 

ईशारों ही इशारों में 

बयाँ कर दी सभी बातें 

ओठों पे थी पाबंदी 

निगाहों  ने हद तोड़ी 

टूटी थी जो कड़ियाँ 

निगाहों ने फिर जोड़ी |

निगाहों में सजा सपना 

असम्भव कुछ नहीं छोड़ा 

नयन सारथी पे बैठ 

,मन दूर तक दौड़ा |

एक सहज सी प्रतिक्रिया आपकी निगाहों के नाम |सुंदर गीतिका पर बधाई |

Comment by maharshi tripathi on February 18, 2015 at 6:00pm

अच्छी  रचना  आ. खुर्सीद जी |

कृपया ध्यान दे...

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