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ग़ज़ल- भाग २ धार समय की 8 + 8 + 8 (रोला मात्रिक)

किस सागर में  जान मिलेगी  धार  समय की 

कौन पकड़ पाया जग में रफ़्तार समय की 

युगों युगों तक फैला है कुहसार  वसन  का                       कुहसार =पर्वतांचल 

कौन अज़ल से  बाँध रहा  दस्तार  समय की                    दस्तार = पगड़ी 

नोक कलम की  पर रखते हैं  काल तीन हम 

केवल हमने  स्वीकारी  ललकार  समय की 

ख़ार दर्द के  चुनकर गीत  उगायेंगे  हम 

कर जायेंगे  वादी  हम गुलज़ार  समय की 

तू  ऊषा की लाली   मैं संध्या  का केसर 

तेरे मेरे   बीच खड़ी  दीवार  समय की 

मोल जानते  हैं माटी का  हम बंजारे 

धाक जमेगी  क्या हम पर  ज़रदार  समय की                ज़रदार = धनी \मालदार 

मान गँवाकर   सोना -चाँदी   मिट्टी समझो 

रूह खरीदोगे क्या तुम  ख़ुद्दार समय की 

ये माह-ओ-' खुरशीद ' सितारे  इस अंबर के 

सदियों से करते  आये  बेगार समय की 

मौलिक व अप्रकाशित 

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Comment by khursheed khairadi on January 6, 2015 at 10:28am

आदरणीय गिरिराज सर ,आदरणीय सौरभ सर  आप जैसे विशाल बरगदों की छाया , कलम को सदा तरोताज़ा रखती है |आशीर्वाद बनाये रखियेगा |सादर 

Comment by khursheed khairadi on January 6, 2015 at 10:26am

आदरणीय हरिप्रकाश जी सर सादर  आभार  स्नेह बनाये रखियेगा |आदरणीय सुशील सरना जी सर हार्दिक आभार आपके स्नेह अनमोल है |सादर 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on January 3, 2015 at 8:28pm

आदरणीय खुर्शीद भाई , गज़ल की दूसरी किश्त भी बे मिसाल हुई है , हार्दिक बधाई स्वीकार करें ।

तू  ऊषा की लाली   मैं संध्या  का केसर 

तेरे मेरे   बीच खड़ी  दीवार  समय की 

ये माह-ओ-' खुरशीद ' सितारे  इस अंबर के 

सदियों से करते  आये  बेगार समय की   ---- बहुत खूब ! आदरणीय बधाई

Comment by Sushil Sarna on January 3, 2015 at 3:38pm

तू ऊषा की लाली मैं संध्या का केसर
तेरे मेरे बीच खड़ी दीवार समय की

उफ्फ गजब की कल्पना और शानदार प्रस्तुति … हम दिल से आपकी इस प्रस्तुति को सलाम करते हैं आदरणीय … हार्दिक बधाई


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on January 3, 2015 at 7:16am

तीनों कालों को हम रखते कलम-नोंक पर
केवल हमने स्वीकारी ललकार समय की

और
सोना-चाँदी मिट्टी है जब मान गया तो  
क्या तुम रूह खरीदोगे ख़ुद्दार समय की

उपर्युक्त बदलाव कैसे रहेंगे, बताइयेगा. हमने बस अपनी कही भर है. अलबत्ता, प्रस्तुति के इस वाले भाग में वाकई ग़ज़ल हुई है, भाई ! फिरभी गीतात्मकता के देसीपन की छौंक खूब लगी है !  

युगों युगों तक फैला है कुहसार वसन का
कौन अज़ल से बाँध रहा दस्तार समय की

तू ऊषा की लाली मैं संध्या का केसर
तेरे मेरे बीच खड़ी दीवार समय की

वाह वाह वाह !

और फिर मक़्ता में अपने नाम को क्या ही ख़ूबसूरती से पिरोया है आपने, भाई ! बहुत खूब !!

Comment by Hari Prakash Dubey on January 2, 2015 at 6:32pm

रूह खरीदोगे क्या तुम  ख़ुद्दार समय की .......आदरणीय खुरशीद जी , जगब की कल्पना , सुन्दर रचना पर हार्दिक बधाई !

Comment by khursheed khairadi on January 2, 2015 at 2:50pm

आदरणीय गोपालनारायण जी सर ,इसी आशीर्वाद और इस्लाह के प्रसाद की चाह इस मंच पर खींच लाती  है |धन्य है आपकी कलम |अगर आपकी अनुमति हो तो मैं आपके इस स्नेह-प्रसाद को अपने शेर के ऊला मिसरे के रूप में प्रयोग कर लूं |इतना  कृपाकांक्षी तो शायद यह अनुज होगा ही |सादर अभिनन्दन 

Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on January 2, 2015 at 1:59pm

नोक  कलम की प्रखर काल त्रय  पर हम रखते

केवल हमने स्वीकारी ललकार समय की   -------------- वामनकर जी की  इच्छा मैंने पूरी कर दी i सादर i  बहुत बहुत बधाई i

Comment by khursheed khairadi on January 2, 2015 at 1:57pm

आदरणीय  सोमेश जी , मिथिलेश सर जी  हार्दिक आभार |

आदरणीय मिथिलेश जी " तीनों काल कलम की नोक पे'  हम रखते हैं "  करता हूं तो पे की मात्रा गिरानी पढ़ेगी ,अगर यह रूप पहले वाले से कुछ स्वीकार्य हो तो मंच की अनुमति चाहूँगा | सादर 

Comment by somesh kumar on January 2, 2015 at 11:00am

तू  ऊषा की लाली   मैं संध्या  का केसर 

तेरे मेरे   बीच खड़ी  दीवार  समय की 

मोल जानते  हैं माटी का  हम बंजारे 

धाक जमेगी  क्या हम पर  ज़रदार  समय की \बहुत सुंदर प्रस्तुति भाई जी 

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