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एक ग़ज़ल - ख़ुद को आज़माकर देखूँ

रब ना करे मैं ऐसा मंज़र देखूँ
दोस्त के हाथ में खंज़र देखूँ

सबकी ख़ुशी सलामत रख मौला
ना ही टूटता किसी का घर देखूँ

गम दे तो हिम्मत भी बक्श ख़ुदा
आँखों में किसी की ना डर देखूँ

ख़्वाब पूरे होते नहीं देखने भर से
खुद को भी तो आज़माकर देखूँ

ये हवा भी हारेगी मिरे यकीं से
उम्मीद-ए-चिराग़ जला कर देखूँ

ठान ही ली जब चलने की 'विवेक'
फिर क्यूँ मुश्किल-ए-सफ़र देखूँ
#मौलिक व अप्रकाशित#

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Comment by मनोज अहसास on January 22, 2020 at 8:33pm

बेशकीमती जानकारी के लिए हार्दिक आभार आदरणीय समर कबीर साहब

Comment by Samar kabeer on January 21, 2020 at 9:46pm

 //मत ले मैं आपने मंजर और खंजर इस्तेमाल कर लिया है इसलिए यह ग़ज़ल जर अंत वाले काफिये की कैद में आ गई है जिसका पूरी ग़ज़ल में निर्वाह करना पड़ेगा अर्थात ऐसे ही कवाफी लेने पड़ेगे जिनके अंत मे जर हो//

मनोज जी,ऐसा नहीं है, क़वाफ़ी अर के हैं,मतले में 'मंज़र' में 'ज्' के नीचे बिंदी है जो "ख़ंजर" में नहीं है,इसलिए इस ग़ज़ल में क़वाफ़ी दुरुस्त हैं ।

Comment by Samar kabeer on January 21, 2020 at 9:40pm

जनाब विवेक ठाकुर 'मन' जी आदाब,पहली बार ओबीओ पर आपकी रचना पढ़ रहा हूँ,आपका स्वागत है ।

ग़ज़ल का प्रयास अच्छा है लेकिन बह्र,शिल्प,व्याकरण की दृष्टि से अभी ये बहुत समय चाहती है, ओबीओ पर मौजूद 'ग़ज़ल की कक्षा' का लाभ लें,अध्यन करें,प्रयासरत रहें,शुभेच्छाएँ ।

Comment by मनोज अहसास on January 21, 2020 at 7:23pm

प्रिय मित्र इस ग़ज़ल की बहर क्या है यह स्पष्ट करें ग़ज़ल की बहर गजल के ऊपर लिख दिया करें इससे गजल को समझने में आसानी रहती है मत ले मैं आपने मंजर और खंजर इस्तेमाल कर लिया है इसलिए यह ग़ज़ल जर अंत वाले काफिये की कैद में आ गई है जिसका पूरी ग़ज़ल में निर्वाह करना पड़ेगा अर्थात ऐसे ही कवाफी लेने पड़ेगे जिनके अंत मे जर हो

सादर

Comment by विवेक ठाकुर "मन" on January 18, 2020 at 10:53pm
बहुत बहुत धन्यवाद आदरणीय
Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on January 17, 2020 at 7:00am

आ. भाई विवेक जी, अच्छी गजल हुई है, हार्दिक बधाई ।

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