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आओ और निकट से देखो

हिलोरें लेते इस पारावार को

हमारा जीवन भी ऐसा ही है

नीर जैसा स्वच्छ और निर्मल

 

जब पयोधि क़ी लहरें छूती हैं

रेत क़ी फ़ैली हुई कगार को

तब वह समेट लेती सब कुछ

और ले जाती है पयोनिधी में

 

हम मनुष्य भी तो ऐसे ही हैं

जब हम प्रेम में होते हैं तब

ढूंढते रहते हैं बस एक साहिल

ताकि समेट सकें स्वयं में सब कुछ

 

किंतु उदधि और मनुज क़ा प्रेम

उदर में ज्य़ादा काल नहीं टिकता

अर्णव तट को लौटाता अगले दिन

और मनुष्य उपयोग के बाद! !

 मौलिक व अप्रकाशित

-प्रदीप देवीशरण भट्ट -01.01.2020

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Comment by Bhupender singh ranawat on January 13, 2020 at 8:39am

Shandaar rachna

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on January 9, 2020 at 3:47pm

आ. भाई प्रदीप देवीशरण जी, रचना के 'फीचर्ड' होने पर हार्दिक बधाई ।

Comment by Samar kabeer on January 9, 2020 at 2:54pm

जनाब प्रदीप जी आदाब,अच्छी रचना हुई है,बधाई स्वीकार करें ।

Comment by नाथ सोनांचली on January 4, 2020 at 7:46am

आद0 प्रदीप देवीशरण भट्ट जी सादर अभिवादन। बढ़िया भाव सम्प्रेषण,, बढिया सोच,, इस उम्दा सृजन पर मेरी कोटिशः शुभकामनाएं और बधाई आपको

Comment by आशीष यादव on January 3, 2020 at 2:34pm

आदरणीय श्री प्रदीप देवीशरण भट्ट जी इस सार्थकरचना पर बधाई।

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on January 3, 2020 at 1:43pm

आ. भाई प्रदीप देवीशरण जी, सादर अभिवादन। सुंदर रचना हुई है हार्दिक बधाई स्वीकारें ।

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