For any Query/Feedback/Suggestion related to OBO, please contact:- admin@openbooksonline.com & contact2obo@gmail.com, you may also call on 09872568228(योगराज प्रभाकर)/09431288405(गणेश जी "बागी")

ग़ज़ल - इन्हीं चुपचाप गलियों में जिये रिश्ते तलाशेंगे // सौरभ

1222 1222 1222 1222

 

सिरा कोई पकड़ कर हम उन्हें फिर से तलाशेंगे

इन्हीं चुपचाप गलियों में जिये रिश्ते तलाशेंगे 

 

अँधेरों की कुटिल साज़िश अगर अबभी न समझें तो 

उजालों के लिए मिट्टी के फिर दीये तलाशेंगे 

 

कभी उम्मीद से भारी नयन सपनों सजे तर थे
किसे मालूम था ये ही नयन सिक्के तलाशेंगे !

 

दिखे है दरमियाँ अपने बहुत.. पर खो गया है जो
उसे परदे, भरी चादर, रुँधे तकिये तलाशेंगे 

 

हृदय में भाव था उसने निछावर कर दिया खुद को
मगर सोचो कि उसके नाम अब कितने तलाशेंगे ? 

 

चिनकती धूप से बचते रहे थे आजतक, वो ही-
पता है कल कभी जुगनू, कभी तारे तलाशेंगे 

 

मुबारक़ हो उन्हें दिलकश पतंगों की उड़ानें पर
ज़मीं पर घूमते ’सौरभ’ बचे कुनबे तलाशेंगे 

************
सौरभ 

Views: 1268

Comment

You need to be a member of Open Books Online to add comments!

Join Open Books Online

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on November 2, 2019 at 6:53pm

आ. भाई सौरभ जी, सादर अभिवादन । बेहतरीन प्ररणादायी गजल के लिए कोटि कोटि बधाई।

अँधेरों की कुटिल साज़िश अगर अबभी न समझें तो 

उजालों के लिए मिट्टी के फिर दीये तलाशेंगे 

 यह तो सदा मन में बसा रहेगा...


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on November 2, 2019 at 11:26am

आदरणीय सुरेन्द्र नाथ सिंह ’कुशक्षत्रप’ जी, इस प्रस्तुति पर आपकी दृष्टि पड़ी, आपकी उदार टिप्पणी से यह ग़ज़ल समृद्ध हुई, यह मुझ जैसे रचनाकार के लिए अत्यंत् उत्साहवर्द्धक है. आपका हार्दिक धन्यवाद.

Comment by नाथ सोनांचली on November 1, 2019 at 11:15am

आद0 सौरभ पांडेय जी सादर प्रणाम। बहुत दिन बाद आपकी कोई ग़ज़ल पढ़ रहा हूँ। पर बेहतरीन अशआर कहे हैं आपने। हर शेर पर मेरी दाद कुबूल करें।

दिखे है दरमियाँ अपने बहुत.. पर खो गया है जो
उसे परदे, भरी चादर, रुँधे तकिये तलाशेंगे 

यह शेर दिल को छू गया,, वाह वाह वाह

मकता भी गज़ब कही आपने,, बहुत बहुत बधाई। सादर

Comment by Samar kabeer on October 30, 2019 at 11:25am

//डेढ़ मिसरों के हवाले से आपकी प्रशंसा सुखकर है.//

भाई जी,शैर तो दो मिसरों का ही कापी किया था,पर न जाने क्यों डेढ़ मिसरा ही पेस्ट हुआ:-)))


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on October 30, 2019 at 12:22am

आदरणीय सुशील सरना जी, आपने उस शेर को सम्मान दिया है जो पारस्परिक रिश्तों की महीनी को उजागर करता हुआ है. ग़ज़ल पर आपकी सकारात्मक टिप्पणी के लिए सादर धन्यवाद.


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on October 30, 2019 at 12:20am

आदरणीय समर साहब, ग़ज़ल को लेकर डेढ़ मिसरों के हवाले से आपकी प्रशंसा सुखकर है. वैसे यह आपकी सदाशयता ही है कि आपने इस प्रस्तुति को मान दिया है. 

हार्दिक धन्यवाद 


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on October 30, 2019 at 12:13am

भाई आसिफ़ ज़ैदी जी, हार्दिक धन्यवाद 

Comment by Sushil Sarna on October 29, 2019 at 4:52pm

दिखे है दरमियाँ अपने बहुत.. पर खो गया है जो
उसे परदे, भरी चादर, रुँधे तकिये तलाशेंगे

वाह परम् आदरणीय सौरभ जी वाह खूबसूरत अहसासों से लबरेज़ अशआर .... नमन आपकी लेखनी को और इस बेहतरीन ग़ज़ल के लिए दिल की असीम गहराईयों से हार्दिक बधाई। दीपावली की हार्दिक शुभकामनाएं सर।


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on October 29, 2019 at 12:45pm
आदरणीय दण्डपानी नाहक जी, आपकी सदाशयता के प्रति हृदय तल से आभारी हूँ। प्रस्तुति आपको पसंद आयी यही रचनाकर्म की सार्थकता है।
सधन्यवाद
Comment by Samar kabeer on October 28, 2019 at 4:07pm

जनाब सौरभ पाण्डेय जी आदाब,बहुत समय बाद ओबीओ पर आपकी ग़ज़ल पढ़ने का मौक़ा मिला है ।

बहुत सुंदर और सटीक ग़ज़ल हुई है,हर शैर आपके ख़ास लहजे की निशान दही करता हुआ है,

'अगर अबभी न समझें तो 

उजालों के लिए मिट्टी के फिर दीये तलाशेंगे'

ये शैर हासिल-ए-ग़ज़ल कहा जा सकता है,दाद के साथ मुबारकबाद पेश करता हूँ ।

कृपया ध्यान दे...

आवश्यक सूचना:-

1-सभी सदस्यों से अनुरोध है कि कृपया मौलिक व अप्रकाशित रचना ही पोस्ट करें,पूर्व प्रकाशित रचनाओं का अनुमोदन नही किया जायेगा, रचना के अंत में "मौलिक व अप्रकाशित" लिखना अनिवार्य है । अधिक जानकारी हेतु नियम देखे

2-ओपन बुक्स ऑनलाइन परिवार यदि आपको अच्छा लगा तो अपने मित्रो और शुभचिंतको को इस परिवार से जोड़ने हेतु यहाँ क्लिक कर आमंत्रण भेजे |

3-यदि आप अपने ओ बी ओ पर विडियो, फोटो या चैट सुविधा का लाभ नहीं ले पा रहे हो तो आप अपने सिस्टम पर फ्लैश प्लयेर यहाँ क्लिक कर डाउनलोड करे और फिर रन करा दे |

4-OBO नि:शुल्क विज्ञापन योजना (अधिक जानकारी हेतु क्लिक करे)

5-"सुझाव एवं शिकायत" दर्ज करने हेतु यहाँ क्लिक करे |

6-Download OBO Android App Here

हिन्दी टाइप

New  देवनागरी (हिंदी) टाइप करने हेतु दो साधन...

साधन - 1

साधन - 2

Latest Activity

Manjeet kaur replied to Admin's discussion अति आवश्यक सूचना : कृपया अवश्य अवगत हों .....
"ओ बी ओ मंच से बहुत कुछ सीखने को मिला इसके बंद होने की खबर दुखद और पीड़ादाई लगी। अजय गुप्ता जी की…"
9 hours ago
Manjeet kaur commented on धर्मेन्द्र कुमार सिंह's blog post रहना हो भारत में जिंदा, चुप रहिए (ग़ज़ल)
"धर्मेंद्र कुमार जी आज के मुश्किल दौर में इतना जिगरा ! यथार्थ और सटीक वर्णन के लिए बहुत बहुत बधाई"
9 hours ago
Sushil Sarna posted a blog post

दोहा सप्तक. . . .मंच

दोहा सप्तक. . . . . मंचअभिनय करते मंच पर, माटी के किरदार ।जीवन की अनुभूतियाँ, करते वो साकार ।।यह जग…See More
11 hours ago
धर्मेन्द्र कुमार सिंह posted a blog post

रहना हो भारत में जिंदा, चुप रहिए (ग़ज़ल)

बह्र: 22 22 22 22 22 2 रहना हो भारत में जिंदा, चुप रहिएजंगल का कानून है पहला, चुप रहिएमँहगाई से…See More
15 hours ago
रोहित डोबरियाल "मल्हार" posted a blog post

दास्तां

एक हो दास्तां तो सुनाएं,लंबी है कहानी, फिर कभी।मिले थे जिस जगह इक उम्र पहले,वो धुंधली सी निशानी,…See More
15 hours ago
Awanish Dhar Dvivedi posted a blog post

समय

समय को दोष देना क्यूँ समय जीना सिखाता है समय की गति सुनिश्चित है समय ही तो विधाता है।। समय का खेल…See More
15 hours ago
धर्मेन्द्र कुमार सिंह commented on धर्मेन्द्र कुमार सिंह's blog post देश की बदक़िस्मती थी चार व्यापारी मिले (ग़ज़ल)
"बहुत बहुत शुक्रिया आदरणीय सौरभ जी"
16 hours ago
आशीष यादव replied to Admin's discussion अति आवश्यक सूचना : कृपया अवश्य अवगत हों .....
"उम्मीद है कि इस पटल से संबंधित कोई अच्छी खबर आएगी।"
22 hours ago

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey commented on धर्मेन्द्र कुमार सिंह's blog post देश की बदक़िस्मती थी चार व्यापारी मिले (ग़ज़ल)
"इस सुंदर बुनावट और कहन पर आज नजर पड़ी, आदरणीय धर्मेन्द्र जी.  हार्दिक बधाई   "
Monday
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' shared their blog post on Facebook
May 24
धर्मेन्द्र कुमार सिंह commented on धर्मेन्द्र कुमार सिंह's blog post देश की बदक़िस्मती थी चार व्यापारी मिले (ग़ज़ल)
"बहुत बहुत शुक्रिया आदरणीय Ravi Shukla जी"
May 24
धर्मेन्द्र कुमार सिंह commented on धर्मेन्द्र कुमार सिंह's blog post देवता चिल्लाने लगे हैं (कविता)
"बहुत बहुत शुक्रिया आदरणीय Ashok Kumar Raktale जी"
May 24

© 2026   Created by Admin.   Powered by

Badges  |  Report an Issue  |  Terms of Service